पूरी दुनिया इस वक्त सोशल मीडिया के इर्द गिर्द घूमती नजर आती है सोशल मीडिया के बिना किसी का एक पल भी कटना बड़ा मुश्किल हो गया है चाहे मनोरंजन हो समाचार हो या फिर कोई पढ़ाई लिखाई से जुड़ी चीज सोशल मीडिया सबसे पहले हमारे हाथों में चलना शुरू हो जाता है. भारत के अंदर बहुत सारे सोशल मीडिया के के एप्स पर पाबंदियां लगा दी गई इसके बाद भारत के अंदर युवा एप्स को इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं लेकिन आजकल बहुत से ऐसे भी मौजूदा ऐप है जो उल्टे सीधे पोस्ट से भरे हुए हैं कुछ लोगों की राजनीति इसी तरीके के पोस्ट पर निर्भर होती है.

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ऐसे पोस्टों को सोशल मीडिया कंपनी ध्यान नहीं देती इसलिए कंपनियों को लक्ष्मण रेखा के अंदर अपनी मर्यादा साधने चाहिए. अधिकांश पोस्ट से मन आहत हो जाता है यही डर रहता है कि जो पोस्ट इस समय हमारी मोबाइल स्क्रीन पर है अगर वह कम उम्र के बच्चों तक होगा तो उन पर क्या प्रभाव पड़ेगा ऐसे पोस्टो में धार्मिक उन्माद, सत्ता पक्ष और ना जाने क्या-क्या उकसाने वाले शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है.

जो आने वाली युवा पीढ़ी को गलत दिशा में ले जाने का काम करते हैं लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि सोशल मीडिया पूरी तरह से असामाजिक होता है वहां एजेंडा चलाने वालों की भीड़ बढ़ती चली जा रही है ऐसे में यूजर्स को लेकर सोशल मीडिया कंपनी तक अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती जाहिर है कि सोशल मीडिया कंपनियों के लिए मर्यादा में रहना बहुत जरूरी है सोशल मीडिया कंपनियों को इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि उनके प्लेटफार्म से क्या चीज शेयर की जा रही है और क्या चीज शेयर नहीं की जानी चाहिए.

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ऐसे में युवाओं के प्रति सोशल मीडिया कंपनियों की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती है क्या? जाहिर है सोशल मीडिया को लेकर इस समय दो सुर्खियां है एक देश से एक सात समंदर पार ऑस्ट्रेलिया से.

भारत सरकार में सोशल मीडिया को जवाबदेह बनाने के लिए गाइडलाइन जारी की है लेकिन गाइडलाइन शादी करते हुए सरकार की ओर से साफ किया गया कि यूजर्स को असहमति क्या अधिकार है और कंपनी को कारोबार का लेकिन उसके बावजूद एक मर्यादा होनी बहुत जरूरी है.

प्रिंट मीडिया की निगरानी के लिए प्रेस परिषद और टीवी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए ब्रॉडकास्टर होता है लेकिन सोशल मीडिया की निगरानी के लिए कोई भी नहीं है इसी वजह से सोशल मीडिया पर मनमानी चलती रहती है. इस मनमानी का नतीजा हम सबके सामने है बड़े से बड़ा प्लेटफार्म पर आजादी के नाम पर जो परोसा जा रहा है उनमें ज्यादातर चिंताजनक हमारे युवाओं पर पड़ने वाला असर है.

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क्या सोशल मीडिया की मर्यादा मुमकिन नहीं ?

अगर भारत सरकार चाहे तो सोशल मीडिया के लिए लक्ष्मण रेखा कभी भी हो सकती है लेकिन आत्म संयम के साथ साथ इस तरह के नकेल के जरूरत तो अरसे से महसूस की जा रही है ऑस्ट्रेलिया ने फेसबुक पर नकेल डाल दी न्यूज़ कंटेंट और प्रमोट को लेकर कानून बना दिया गया ऑस्ट्रेलिया के इस कानून पर देश के साथ दुनिया की निगाहें अब न्यूज़पेपर एसोसिएशन ने भारत में भी यह मांग उठाई है इस पर सरकार की नजर भी है लेकिन यह कानून कब आता है इस बात का जवाब तो सरकार के पास ही है.

भारत के अंदर सोशल मीडिया व डिजिटल मीडिया के लिए निगरानी करने के लिए एक कानून बनाने की आवश्यकता जताई गई थी साथ ही सरकार से निवेदन भी किया जा चुका है की इस तरह के कानून बनाए जाएं ताकि लोग मति भ्रष्ट करने के पोस्ट शेयर ना करें.

इसी तरह हाल ही में व्हाट्सएप पर भी चर्चा बनी रही जिसका कारण था की व्हाट्सएप अपने यूजर्स की निजी जानकारियों से अपनी कमाई का जरिया और ज्यादा बढ़ाना चाहता था सोशल मीडिया हमारी जिंदगी में इस कदर बढ़ चुका है कि ट्विटर व्हाट्सएप के विकल्प koo और singnal पर आ गया .

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सोशल मीडिया कंपनियां कितनी भी बदल जाए लेकिन उनका रंग बदलना थोड़ा मुश्किल है जब तक एक सख्त कानून नहीं आ जाता है ऐसे में युवा यूजर्स के साथ-साथ कंपनियों को भी अपनी मर्यादा में रहने की बहुत आवश्यकता है.

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