कैप्टन कूल कहे जाने वाले महेंद्र सिंह धोनी टीम इंडिया के सबसे सफलतम कप्तान माने जाते हैं। आज धोनी जिस मुकाम पर हैं, वहां तक पहुंचना आसान नहीं था। कुछ सालों पहले महज 300 रुपये के लिए काम करने वाले धोनी पर आज करोड़ों की बरसात होती है। हर बड़ा ब्रांड उनके लिए लाइन लगाए खड़ा रहता है, लेकिन आसमान की इस ऊंचाई पर पहुंचने के लिए धोनी को काफी मशक्कत करनी पड़ी। एक छोटे शहर की गलियों में क्रिकेट खेलने वाले धोनी कैसे आज इस मुकाम पर पहुंचे इसकी कहानी बेहद दिलचस्प है। पढ़ें: धोनी के जीवन का सफर-

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1992 में जब धोनी छठी क्लास में पढ़ रहे थे, तभी उनके स्कूल को एक विकेट कीपर की जरूरत थी, लिहाजा उन्हें विकेट के पीछे खड़े होने का मौका मिला। जब स्कूल के दोस्त पढ़ाई से समय बचने पर खेलते थे तब महेंद्र सिंह धोनी क्रिकेट से समय मिलने पर पढ़ाई किया करते थे। स्कूल के बाद धोनी जिलास्तरीय कमांडो क्रिकेट क्लब से खेलने लगे थे। इसके बाद उन्होंने सेंट्रल कोल फील्ड लिमिटेड की टीम से भी क्रिकेट खेला और हर जगह अपने खेल से लोगों का दिल जीतते चले गए।

2003-04 में कड़ी मेहनत के कारण धोनी को जिंबाब्वे और केन्या दौरे के लिए भारतीय ‘ए’ टीम में चुना गया। जिंबाब्वे के खिलाफ उन्होंने विकेट कीपर के तौर पर बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए 7 कैच और 4 स्टंपिंग कीं। इस दौरे पर बल्लेबाजी करते हुए धोनी ने 7 मैचों में 362 रन भी बनाए। धोनी के कामयाब दौरे के बाद तत्कालीन टीम इंडिया के कप्तान सौरव गांगुली ने उन्हें टीम में लेने की सलाह दी। 2004 में धोनी को पहली बार टीम इंडिया में जगह मिली। हालांकि वह अपने पहले मैच में कोई खास कमाल नहीं कर पाए और जीरो पर आउट हो गए। इसके बाद भी कई मैचों में धोनी का बल्ला नहीं चला, लेकिन 2005 में पाकिस्तान के खिलाफ खेलते हुए धोनी ने 123 गेंदों पर 148 रनों की ऐसी तूफानी पारी खेली कि सभी इस खिलाड़ी के मुरीद बन गए। इसके कुछ दिनों बाद ही धोनी ने श्रीलंका के खिलाफ वनडे मैच में बल्लेबाजी करते हुए 183 रनों की पारी खेली जो किसी भी विकेटकीपर बल्लेबाज का अब तक का सर्वाधिक निजी स्कोर है। इसके बाद से एक दिवसीय मैचों में उन्हें ‘गेम-चेंजर’ माना जाने लगा।

2007 में बने वनडे के कप्तान 

टीम वे भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान और भारत के सबसे सफल एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कप्तान रह चुके हैं। धोनी भारतीय एक दिवसीय के सबसे शांतचित्त कप्तानों में से जाने जाते हैं। उनकी कप्तानी में भारत ने 2007 आईसीसी विश्व ट्वेन्टी 20, 2007–08 कॉमनवेल्थ बैंक सीरीज , 2011 क्रिकेट विश्व कप, आइसीसी चैम्पियंस ट्रॉफ़ी 2013 और बॉर्डर-गावस्कर ट्राफी जीती जिसमें भारत ने ऑस्ट्रेलिया को 4-0 से हराया। उन्होंने भारतीय टीम को श्रीलंका और न्यूजीलैंड में पहली अतिरिक्त वनडे सीरीज़ जीत दिलाई। 02 सितम्बर 2014 को उन्होंने भारत को 24 साल बाद इंग्लैंड में वनडे सीरीज में जीत दिलाई।

2011 वनडे विश्व कप

बतौर खिलाड़ी धोनी ने पहला वनडे विश्व साल 2007 में खेला। राहुल द्रविड़ की कप्तानी में वेस्टइंडीज गई टीम इंडिया का सफर केवल तीन मैचों के बाद ही खत्म हो गया। 2007 विश्व कप से शर्मिंदा होकर लौटी टीम इंडिया में कई बदलाव हुए और कप्तानी धोनी को सौंप दी गई। बतौर कप्तान धोनी को पहला वनडे विश्व कप खेलने का मौका 2011 में मिला। भारत में आयोजित होने की वजह से फैंस की उम्मीदें और भी बढ़ गई थी लेकिन विश्व कप का ये रिकॉर्ड था कि कोई टीम अपने घर में ट्रॉफी नहीं जीत पाई है। धोनी ने इस रिकॉर्ड को भी तोड़ दिया। पहले मैच में बांग्लादेश के 87 रनों से हराकर भारत ने 2007 विश्व कप की शर्मनाक हार का बदला लिया। इसके बाद टीम इंडिया ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। युवराज सिंह, गंभीर और विरेंद्र सहवाग ने विपक्षी बल्लेबाजों पर कहर ढाया हुआ था। वहीं अपना आखिरी विश्व कप खेल रहे सचिन तेंदुलकर का बल्ला भी जमकर बोल रहा था। गेंदबाजी अटैक की अगुवाई सीनियर तेज गेंदबाज जहीर खान कर रहे थे। भारतीय टीम ने 6 में 4 लीग मैच जीतकर ग्रुप बी में दूसरे नंबर पर जगह बना ली थी। सेमीफाइनल मैच भारत और चिर प्रतिद्वंदी पाकिस्तान के बीच खेला जाना था। मोहाली में हुए इस मैच को देखने हजारों दर्शकों के साथ दोनों देशों के प्रधानमंत्री भी पहुंचे थे। मास्टर ब्लास्टर की 85 रनों की पारी और गेंदबाजों के साझे प्रयास की बदौलत भारतीय टीम ने पाकिस्तान को हरा फाइनल में जगह पक्की की।

मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में खेले गए इस मैच में श्रीलंकाई बल्लेबाज महेला जयवर्धने ने तूफानी शतक लगाया और भारतीय फैंस की धड़कने बढ़ा दी। भारत के सामने जीत के लिए 275 रनों का लक्ष्य था। लक्ष्य का पीछा करने उतरे टीम इंडिया ने पहले ही ओवर सहवाग का विकेट खो दिया। सचिन-गंभीर ने पारी को आगे बढ़ाने की कोशिश की लेकिन लसिथ मलिंगा ने तेंदुलकर को आउट कर पूरे स्टेडियम को खामोश कर दिया। इसके बाद कोहली और गंभीर ने भारतीय टीम की उम्मीदे जगाई। 22वें ओवर में कोहली दिलशान के ओवर में आउट हुए। 114 पर तीन बड़े विकेट खोने के बाद टीम को टूर्नामेंट में अपने सबसे सफल बल्लेबाज की जरूरत थी। सभी को उम्मीद थी कि युवराज नीचे उतरेंगे लेकिन एक बार फिर धोनी ने चौंकाने वाला फैसला लिया और बैट लेकर खुद मैदान में उतरे। बतौर बल्लेबाज धोनी के लिए टूर्नामेंट कुछ खास नहीं रहा था, ऐसे में उनका ये फैसला गलत साबित हो सकता था लेकिन ऐसा हुआ नहीं। धोनी ने 79 गेंदो पर 91 रनों की मैचविनिंग पारी खेली और आखिरी गेंद पर छक्का लगाकर भारतीय टीम का 28 साल पुराना सपना पूरा किया।

2013 चैंपियंस ट्रॉफी

अपने कैबिनेट में दो विश्व कप ट्रॉफी जमा करने के बाद धोनी की नजर चैंपियंस ट्रॉफी कर थी। 2011 विश्व कप के दो साल बाद धोनी को ये मौका मिला, जब टीम इंडिया चैंपियंस ट्रॉफी खेलने इंग्लैंड पहुंची। चैंपियंस ट्ऱॉफी में भारत की सलामी जोड़ी रोहित शर्मा और शिखर धवन ने धमाल मचाया था। इसके पीछे रोहित को ऊपरी क्रम में खिलाने का धोनी का फैसला था। बल्लेबाजी में जहां रोहित-धवन छाए थे, वहीं गेंदबाजी का जिम्मा सर रविंद्र जडेजा और ईशांत शर्मा ने संभाला था। पूरे टूर्नामेंट में अच्छी बल्लेबाजी कर रही टीम इंडिया ने फाइनल मैच में के वल 129/7 का स्कोर बनाया।

हालांकि अश्विन और ईशांत ने इंग्लिश बल्लेबाजों के लिए 130 के मामूली लक्ष्य को भी मुश्लिक बना दिया। फाइनल मैच के आखिरी ओवर में इंग्लैंड को जीत के लिए 15 रन चाहिए थे और धोनी ने गेंद अश्विन को थमाई। पहली गेंद डॉट रही लेकिन अगली गेंद पर स्टुअर्ट ब्रॉड ने चौका लगाया। अगली तीन गेंदो पर कुल पांच रन आए। आखिरी गेंद पर जीत के लिए 6 रनों की जरूरत थी और अश्विन ने बल्लेबाज को लेंथ से बीट किया। आखिरी गेंद पर कोई रन नहीं आया और टीम इंडिया ने चैंपियंस ट्रॉफी पर कब्जा किया। इसी के साथ धोनी तीन आईसीसी ट्रॉफी जीतने वाले दुनिया के अकेले कप्तान बन गए।

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स्कूल में ही थामा बल्ला

महेंद्र सिंह धोनी का जन्म झारखंड के रांची में हुआ था, उनके पिता का नाम पान सिंह और मां का नाम देवकी देवी है, धोनी की एक बहन जयंती और एक भाई नरेंद्र भी है। धोनी के परिजनों ने कभी सोचा भी नहीं था, कि उनका बेटा एक दिन पूरी दुनिया में उनका और अपने देश का नाम रौशन करेगा। धोनी की पढ़ाई रांची के जवाहर विद्यालय में हुई, इसी स्कूल में सबसे पहले धोनी ने क्रिकेट का बल्ला भी थामा था। 1992 में जब धोनी छठी क्लास में पढ़ रहे थे, तभी उनके स्कूल को एक विकेट कीपर की जरूरत थी, लिहाजा उन्हें विकेट के पीछे खड़े होने का मौका मिला। जब स्कूल के दोस्त पढ़ाई से समय बचने पर खेलते थे तब महेंद्र सिंह धोनी क्रिकेट से समय मिलने पर पढ़ाई किया करते थे। स्कूल के बाद धोनी जिलास्तरीय कमांडो क्रिकेट क्लब से खेलने लगे थे। इसके बाद उन्होंने सेंट्रल कोल फील्ड लिमिटेड की टीम से भी क्रिकेट खेला और हर जगह अपने खेल से लोगों का दिल जीतते चले गए।

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