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जानिए क्या है हॉलीवुड फिल्म 300 का हल्दी घाटी कनेक्शन

कुछ दिन पहले राजस्थान सरकार के मंत्री मोहनलाल गुप्ता ने सुझाव दिया था कि हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर की जगह राणा प्रताप को विजेता दिखाया जाए. अब राजस्थान के इतिहासकार चंद्रशेखर शर्मा ने एक शोध जारी किया है. शर्मा के हिसाब से राणा प्रताप हल्दीघाटी युद्ध के बाद ज़मीनों के पट्टे जारी करते रहे. इस हिसाब से महाराणा प्रताप की जीत हल्दीघाटी के युद्ध में हुई थी. अगर वो हारे होते तो लोगों को पट्टे कैसे जारी करते?

लोगों का एक खास तबका इस नए ‘इतिहास’ को बहुत पसंद कर रहा है. लेकिन सच्चाई क्या मानी जाए? आइए नजर डालते हैं जून 1576 में हुए हल्दीघाटी के इस युद्ध की ऐसी बातों पर जो अब तक हमारी जानकारी में रही है

2006 में रिलीज हुई  हॉलीवुड फिल्म है ‘300’. इतिहास के एक चर्चित युद्ध पर बनी इस फिल्म में राजा लियोनाइडस अपने 300 सैनिकों के साथ 1 लाख लोगों की फौज से लड़ता है. पतली सी जगह में दुश्मन एक-एक कर अंदर आता है और मारा जाता है.

राणा प्रताप ने इसी तरह की योजना बनाई थी. मगर मुगलों की ओर से लड़ने आए जनरल मानसिंह घाटी के अंदर नहीं आए. मुगल जानते थे कि घाटी के अंदर इतनी बड़ी सेना ले जाना सही नहीं रहेगा. कुछ समय सब्र करने के बाद राणा की सेना खमनौर के मैदान में पहुंच गई. इसके बाद ज़बरदस्त नरसंहार हुआ. कह सकते हैं कि 4 घंटों में 400 साल का इतिहास तय हो गया.

राणा प्रताप की सेना मुगलों की तुलना में एक चौथाई थी. सेना की गिनती की ही बात नहीं थी. कई मामलों में मुगलों के पास बेहतर हथियार और रणनीति थी. मुगल अपनी सेना की गिनती नहीं बताते थे.

मुगलों के इतिहासकार बदांयूनी लिखकर गए हैं, “5,000 सवारों के साथ कूच किया.” दुश्मन को लग सकता था कि 5,000 की सेना है मगर ये असल में सिर्फ घो़ड़ों की गिनती है, पूरी सेना की नहीं. इतिहास में सेनाओं की गिनती के अलग-अलग मत हैं.

राजस्थानी इतिहासकार मुहणौत नैणसी, मुगल इतिहासकार  अबुल फजल और प्रसिद्ध हिस्टोरियन यदुनाथ सरकार के आंकड़ों को मिलाकर एक औसत निकाला जाए तो 5,000 मेवाड़ी और 20,000 मुगल सैनिकों के लड़ने की बात मानी जा सकती है.

मेवाड़ के पास बंदूकें नहीं थीं. जबकि मुगल सेना के पास कुछ सौ बंदूकें थीं.

राणा प्रताप की तरफ से प्रसिद्ध ‘रामप्रसाद’ और ‘लूना’ समेत 100 हाथी थे. मुगलों के पास इनसे तीन गुना हाथी थे. मुगल सेना के सभी हाथी किसी बख्तरबंद टैंक की तरह सुरक्षित होते थे और इनकी सूंड पर धारदार खांडे बंधे होते थे.

राणा प्रताप के पास चेतक समेत कुल 3,000 घोड़े थे. मुगल घोड़ों की गिनती कुल 10,000 से ऊपर थी.

मेवाड़ की तरफ से तोपों का इस्तेमाल न के बराबर हुआ. खराब पहाड़ी रास्तों से राजपूतों की भारी तोपें नहीं आ सकती थीं. जबकी मुगल सेना के पास ऊंट के ऊपर रखी जा सकने वाली तोपें थीं.

युद्ध के बीच में एक समय पर राणा प्रताप को मुगलों ने घेर लिया. उनके दूर से दिखते मुकुट को ही निशाना बनाया जा रहा था. ऐसे में सरदार मन्नाजी झाला ने राणा का मुकुट खुद पहन लिया. कहा जाता है कि राणा उस समय तक बुरी तरह घायल हो गए थे. मुगल सेना ने मन्ना जी को राणा समझ कर निशाना बनाना शुरू किया. मन्ना जी कुछ ही देर तक संघर्ष कर पाए मगर अपनी जान देकर उन्होंने महाराणा प्रताप की जान बचा ली.

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