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आज तीन शख्सियतों, शहीद-ए-आजाद भगत सिंह सुरों से मोह लेने वाली लता मंगेशकर और भारत का पहला व्यक्तिगत ओलपिंक गोल्ड मेडल जीतने वाले अभिनव बिंद्रा का आज जन्मदिन है।

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सबसे पहले बात उस 23 साल के नौजवान की जिसने आज के नौजवानों के दिलों में अपने विचारों और कारनामों से एक अलग जगह बना रखी है। बात, शहीद-ए-आजाद भगत सिंह की जिसने मुस्कुराते हुए अपनी मातृभूमि के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी।

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भगत सिंह की कहा ने उनके कारनामे उन्हें बाकी सभी सिपाहियों से बिल्कुल अलग एक जगह देते हैं। आज हम बात करेंगे उनकी जिंदगी से जुड़ी कुछ खास बातों की।

 

 

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● भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 में लायपुर जिले के बंगा गांव में (यह अब पाकिस्तान में है) में हुआ। पिता का किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती था।

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● भगत सिंह के पिता उनके चाचा अजीत सिंह और स्वर्ण स्वतंत्रता सैनानी थे।

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● भगत सिंह की पढ़ाई लाहौर के डीएवी हाई स्कूल में हुई है।

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● भगत सिंह शादी नहीं करना चाहते थे, फिर भी उनके माता पिता ने शादी करने की कोशिश की तब भगत सिंह ने यह कहकर घर छोड़ा “अगर मेरा विवाह गुलाम भारत में हुआ तो मेरी वधु केवल मृत्यु होगी।” भगत सिंह अपना घर छोड़कर कानपुर आ गए थे।

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● प्रधानमंत्री  मोदी ने रविवार 27 सितंबर को 69 वीं मन की बात के कार्यक्रम में देश के शहीद भगत सिंह को पहले श्रद्धांजलि दी। पीएम ने भगत सिंह की 113 वीं जयंती पर उन्हें याद किया। और 12 साल के लड़के की कहानी बताई आखिर क्या है वो कहानी।

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13 अप्रैल 1919 को बैसाखी वाले दिन रौलट एक्ट के विरोध में देशवासियों ने जलियांवाला बाग में सभा की ब्रिटिश जनरल डायर के क्रूर और दमनकारी आदेशों के चलते निहत्थे लोगों पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसा दीं। इसका असर 12 साल के लड़के भगत सिंह पर पड़ा। उन्होंने कसम खा ली कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ वे आजादी का बिगुल फूकेंगे। उन्होंने पढ़ाई छोड़ कर ‘नौजवान भारत सभा’ की स्थापना की।

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● भारत में स्वतंत्रता संग्राम में लाला लाजपतराय की  महत्वपूर्ण भूमिका थी। वह साइमन कमिशन के विरोध में शामिल थे, जिसमें हुए लाठीचार्ज में वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे। इसके बाद वह पूरी तरह ठीक नहीं हो पाए और 17 नवंबर 1928 को उनकी मौत हो गई। भगत सिंह ने सुखदेव, राजगुरु और चंद्रशेखर आजाद के साथ मिलकर लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने की कसम खा ली थी।

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● भगत सिंह और सुखदेव ने लाला लाजपतराय की मौत का बदला लेने के लिए एक योजना बनाई। इस योजना के तहत लाहौर के पुलिस अधीक्षक जेम्स स्कॉट को मारने की थी, लेकिन ऐसा हो न सका पहचानने में गलती होने की वजह से उन्होंने ब्रिटिश पुलिस के अधिकारी जॉन सांडर्स को मार दिया था।

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● भगत सिंह और राजगुरु का पीछा करने वाले एक भारतीय कॉन्स्टेबल को आजाद ने गोली मार दी थी। उस समय भगत सिंह कई महीनों तक फरार रहे थे।

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● ब्रिटिश पुलिस और जॉन सांडर्स की हत्या के बाद 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली असेंबली में बम फेंका यह बम किसी की हत्या के लिए नहीं बल्कि अंग्रेजी हुकूमत को डराने के लिए था। दरअसल अंग्रेजी सरकार दो बिल ला रही थी। जो भारतीयों के हित में नहीं थे। इसलिए इसे रोकने का कदम उठाया। बटुकेश्वर और भगत सिंह वहां से आसानी से भाग सकते थे, लेकिन दोनों “इंकलाब जिंदाबाद” के नारे लगाते वहीं खड़े रहे और गिरफ्तार हो गए।

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● मुकदमें की सुनवाई पर भी उन्होंने अपना कोई बचाव पेश नहीं किया। उन्होंने उस अवसर का भी इस्तेमाल भारत को आजाद करने के प्रचार में किया।

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● उनकी मौत की सजा की तारीख 30 अक्टूबर 1930 सुनाई गई थी।

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● जेल में उन्होंने विदेशी मूल के कैदियों के साथ अच्छा व्यवहार करने की मांग की थी। उन्होंने 116 दिन की भूख हड़ताल भी की थी।

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● बताया जाता है कि फांसी पर जाते वक्त भगत सिंह और राजगुरु “मेरा रंग दे बसंती चोला” गाना गाते जा रहे थे और चेहरे पर मुस्कुराहट थी। उस समय भगत सिंह, सुखदेव 23 साल के और राजगुरु 22 साल के थे।

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● भगत सिंह को 23 मार्च 1931 को फांसी देने का तय किया गया था, लेकिन अंग्रेज इतना डरे हुए थे कि उन्हें तय की गई तारीख से पहले यानी कि 23 मार्च 1931 को 7:30 बजे फांसी पर चढ़ा दिया।

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● उन्हें फांसी की सजा न्यायाधीश जी सी हिल्टन ने दी थी।

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● 23 की उम्र में भगत सिंह को फांसी दे दी गई। उनकी मृत्यु ने सैकड़ों लोगों को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने को प्रेरित किया।  भगत सिंह का “इंकलाब जिंदाबाद” का नारा काफी प्रसिद्ध हुआ। फिर हर भाषण और लेख में इस नारे का प्रयोग किया जाने लगा।

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