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World Women’s Day 2020: जिंदगी बदलनी है तो जरूर पढ़िए इन तीन बहनों की कहानी

World Women’s Day 2020: तीन बहनें, तीनों आईएएस और तीनों मुख्‍य सचिव। थोड़ी मुश्‍किल सी लगने वाली इस कहानी को पूरा कर दिखाया पंजाब की तीन बहनों ने। पंजाब यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जेसी आनंद की तीन बेटियां उनके परिवार के साथ देश व प्रदेश का गौरव भी बनीं। महिला दिवस पर जानिए तीनों बहनों की कहानी-
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घर के अच्‍छे माहौल ने बनाया अच्‍छा इंसान
मीनाक्षी आनंद चौधरी: 1969 बैच की आईएएस : नवंबर 2005 से अप्रैल 2006 तक मुख्य सचिव रहीं। उन्‍होंने बताया, अपने घर में मैंने कभी नहीं सुना कि हम लड़कियां हैं और किसी से कुछ कम हैं। आसपास के घरों में हमें भेदभाव होता दिखता था। शायद यह भी एक वजह थी कि हम अपने लक्ष्य की ओर आसानी से बढ़ सके। वह कहती हैं, लड़कियां आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए जब अपनी भूमिकासमाज व परिवार का योगदान समझें और खुद को महत्व दें।

महिलाओं के सामने पुरुषों से अधिक चुनौतियां होती हैं
उर्वशी गुलाटी : 1975 बैच की आईएएस : अक्तूबर 2009 से मार्च 2012 तक हरियाणा की मुख्य सचिव थीं। उन्‍होंने बताया, हमारे माता-पिता कोई भेदभाव नहीं करते थे और मानते थे कि शिक्षा मिले तो कोई भी आत्मनिर्भर हो सकता है। हालांकि प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर मैंने भेदभाव महसूस किया। दरअसल अगर अधिकारी एक महिला है तो उसके हर काम पर नजर रखी जाती है। आपको हर काम में पुरुष आईएएस अधिकारियों से ज्यादा अपनी प्रतिभा और काबिलियत साबित करनी होती है।
वह कहती हैं इसमें शक नहीं कि समाज का दृष्टिकोण बदला है। मौजूदा पीढ़ी आत्मविश्वास से लबरेज हैलेकिन मुझे यह कहने में हिचक नहीं है कि समाज में लड़कियों से भेदभाव होते रहे हैं।

ऐसा भी कोई काम है जो लड़कियां नहीं कर सकतीं।
केशनी आनंद अरोड़ा: 1983 बैच की आईएएस : जून 2019 में मुख्य सचिव बनीं, 30 सितंबर 2020 तक इस पद पर रहेंगी
उन्होंने कहा कि हम तीनों ही बहनों ने ऐसे प्रदेश में उपलब्धि हासिल कीजिसकी लैंगिक अनुपात के पैमाने पर देश में स्थिति खराब है। हालांकि अब इसमें सुधार आया है। लेकिन घरों में सुधार के लिए वह मानसिकता बदलनी होगीजिसमें लड़कियों को बोझ समझा जा रहा है। मेरा कोई भाई नहीं थालेकिन बड़ी बहनों की शानदार प्रतिभा ने मुझे प्रेरित किया।

तीनों बहनों के लिए कोई काम असंभव नहीं रहा। माता-पिता ने किसी काम को लड़के और लड़की की सोच के साथ हमें नहीं सौंपा। अपने कॅरिअर में भेदभाव हुआ भी होगा तो मैंने उसे कभी इतनी तवज्जो नहीं दी कि उसका कोई असर हो।
वह कहती हैं ऐसा कोई लक्ष्य नहींजो असंभव है। महिलाओं से यही कहूंगी कि अगर वे देश और समाज के लिए कोई योगदान देना चाहती हैं तो पूरे प्रयास करेंमहिला होने की वजह से झिझकें नहीं।

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