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WORLD CANCER DAY: महामारी से लड़ने वालों के जज्‍बे को सलाम

SPECIAL STORY ON WOLD CANCER DAY:  कैंसर…। भयावहता बताने के लिए ये शब्द ही काफी है। नाम सुन कर अच्छे-अच्छे नास्तिक भी भगवान की शरण ले लेते हैं। बीमारी से निजात पाने की दुआ मांगने लगते हैं। परिवारी जनों का भी यही हाल होता है। जिंदगी रेत के माफिक मुट्ठी से फिसलती लगती है। फिर भी कुछ लोग हिम्मत रखते हैं। लड़ते हैं इस लाइलाज कही जाने वाली बीमारी से। जीतते हैं। फिर अपनी स्वस्थ जिंदगी गुजारते हैं। जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो। कैंसर से जंग जीतने वाले कुछ ऐसे ही जांबाजों से आपकी मुलाकात कराते हैं। ये विदेश से महंगा इलाज करा कर आने वाले सेलिब्रिटी नहीं। आपके आसपास रहने वाले आम लोग ही हैं। जिन्होंने बरेली में ही रहकर एसआरएमएस इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंसेज के आरआर कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर में इलाज कराया और जानलेवा समझी जाने वाली बीमारी कैंसर को मात दी।

केस 1:आठ साल पहले बिहारीपुर निवासी रानी (73) को पेशाब संबंधी दिक्कतें महसूस हुईं। पेशाब करने में जलन होती थी। निजी अस्पताल में दिखाया गया। वहां कैंसर की पुष्टि हुई। आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के चलते परिवार वालों ने रानी को 13 मार्च 2012 को एसआरएमएस में भर्ती कराया। आपरेशन हुआ और फिर पांच हफ्ते सिकाई हुई। आज रानी पूरी तरह स्वस्थ हैं। बीच बीच में जांच के लिए एसआरएमएस जा रही हैं।

भर्ती – 13 मार्च 2012
इलाज पूर्ण- 30 अप्रैल 12

तकलीफ होने पर पहले बरेली के निजी अस्पताल में दिखाया गया। जहां डाक्टर ने कैंसर की बात कही और महंगा इलाज बताया। इस पर एसआरएमएस गए। यहां डाक्टरों ने ठीक होने का भरोसा दिलाया। इलाज शुरू हुआ। डाक्टरों और स्टाफ ने बहुत मदद की। किराया न होने से एसआरएमएस की बसों से जाना शुरू किया। कोई परेशानी नहीं हुई। करीब सवा साल इलाज के बाद ठीक हुई। सभी से कहते हैं। इलाज कराएं तो राममूर्ति मेडिकल कालेज में।
-रानी, (बिहारीपुर) बरेली

केस 2
प्राइवेट जाब करने वाले शाहाबाद (हरदोई) निवासी अशोक कुमार अग्निहोत्री (52) को सात साल (वर्ष 2013) पहले खाने-पीने में दिक्कत शुरू हुई। शाहजहांपुर में दिखाया तो बरेली जाने की सलाह दी गई। इस पर एसआरएमएस ले जाया गया। जहां जांच में मुंह के कैंसर की जानकारी मिली। नाम सुन कर ही परिजनों के साथ राजेश भी डर गए। डाक्टरों ने हौसला दिया। इलाज शुरू हुआ। सिंकाई हुई और कीमो भी। राजेश दो महीने में पूरी तरह स्वस्थ हो गए।

भर्ती – 9 दिसंबर 2013
इलाज पूर्ण- 13 फरवरी 2014

कैंसर की जानकारी होने पर मैं काफी परेशान हुआ। लेकिन एसआरएमएस में डाक्टरों ने काफी हौसला दिया। भरोसा दिया कि अगर हिम्मत बनाए रखी तो इस बीमारी से निजात पा सकता हूं। मैंने भी हार न मान कर कैंसर को जीतने का फैसला किया। आज मैं पूरी तरह स्वस्थ हूं। इसमें सबसे बड़ा योगदान एसआरएमएस और यहां के डाक्टरों और यहां के स्टाफ के सहयोग का है।
-अशोक कुमार अग्निहोत्री, (शाहाबाद) हरदोई

केस 3
किसान श्याम बिहारी (58) को भी सात साल पहले आवाज में बदलाव था और खाने-पीने में दिक्कत थी। पीलीभीत में दिखाया। डाक्टरों ने राममूर्ति अस्पताल जाने की सलाह दी। राममूर्ति में गले का कैंसर बताया गया। नियमित सिकाई और कीमो की बात डाक्टरों ने कही। श्याम बिहारी हिम्मत नहीं हारे। कभी परिवार वालों के साथ तो कभी अकेले ही एसआरएमएस आते। सिकाई या कीमो कराते और वापस घर चले जाते। करीब दो महीना इलाज के बाद श्याम बिहारी आज तरह स्वस्थ हैं।

भर्ती – 17 जनवरी 2012
इलाज पूर्ण- 16 मार्च 2012

इलाज के दौरान राममूर्ति के डाक्टरों पूरी मदद की। हौसला दिया। इसी बदौलत हमने भी हिम्मत नहीं हारी। परिवार को भी हिम्मत बनाए रखने को कहा। परिवार में किसी को तकलीफ न हो तो अकेले भी राममूर्ति अस्पताल जाना जारी रखा। ठीक होकर जाना कि कैंसर जैसी बीमारी का भी इलाज संभव है। अगर यह राममूर्ति में हो तो। मदद के लिए राममूर्ति कालेज का एहसान है।
-श्याम बिहारी, (गांव- कैश) पीलीभीत

केस 4
पेशे से फोटोग्राफर अरशद सईद (52) पूरी तरह स्वस्थ थे। नौ साल पहले परिवार वालों और दोस्तों ने इन्हें आवाज बदल जाने की जानकारी दी। चेकअप में गले का कैंसर पता चला। कई लखनऊ सहित कई जगह दिखाया, लेकिन फायदा नहीं हुआ। रिश्तेदारों ने मुंबई ले जाने की सलाह दी। लेकिन वहां ले जाने में तकलीफ और खर्च को देखते हुए अरशद को एसआरएमएस लाया गया। जहां डा.पियूष ने हिम्मत दी और ठीक होने का भरोसा दिलाया। चार महीने में अरशद पूर्ण स्वस्थ हो गए।

भर्ती – सात जनवरी 2012
इलाज पूर्ण- 10 अप्रैल 12

हम लोग परेशानी में थे। क्या करना है। इलाज के लिए कहां और किसके पास जाएं समझ में नहीं आ रहा था। कई जगह इलाज कराया, लेकिन कुछ नहीं हुआ। ऐसे में अब्बू को हम लोग एसआरएमएस ले गए। वहां डाक्टरों ने हौसला दिया। उम्मीद बंधाई। कैंसर पीड़ित दूसरे मरीजों को ठीक होते देखा। उम्मीद बढ़ी। चार महीने के इलाज में ही अब्बू ठीक हो गए। एसआरएमएस का तहेदिल से शुक्रिया।
-शफदर सईद शमशी (अरशद सईद के बेटे), कोतवाली रोड (पीलीभीत)

भावनात्मक और आर्थिक तनाव भी
वैश्विक रूप से देखें तो बीमारी से होने वाली मौतों में कैंसर दूसरा सबसे बड़ा कारण हैं। वर्ष 2018 में करीब 96 लाख लोगों की कैंसर से जान गई। यानी छह में एक मरीज के निधन की वजह कैंसर बना। फेफड़ा, प्रोस्टेट, कोलोरेक्टल, पेट और लिवर कैंसर से पुरुष ज्यादा प्रभावित हुए। जबकि ब्रेस्ट, कोलोरेक्टल, फेफड़ा और सरवाइकल कैंसर ने महिलाओं पर ज्यादा असर डाला। तेजी से फैल रही यह बीमारी लोगों को भयभीत करने के साथ परिवारों, समाज और स्वास्थ्य सेवाओं पर असर भी असर डाल रही है। इससे शारीरिक, भावनात्मक और वित्तीय रूप से भी तनाव बढ़ रहा है।

क्या और क्यों है कैंसर
कैंसर खुद में कोई बीमारी नहीं बल्कि कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्धि है। जो शरीर के किसी भी अंग में, कभी भी और किसी भी उम्र हो सकती है। यह वृद्धि एक अंग से होती हुई शरीर के दूसरे भाग को भी प्रभावित कर सकती है। शरीर का न भरने वाला घाव, किसी अंग विशेष में लगातार दर्द, तेजी से बढ़ रही गांठ कैंसर की वजह हो सकती है। हां हर गांठ कैंसर नहीं होती। अस्वास्थ्यकर खानपान, जीवनशैली और प्रदूषण कैंसर के लिए जिम्मेदार होते हैं। इनसे बचाव और जागरूकता कैंसर रोकने में कारगर है।

डराते हैं कैंसर के ये भयावह आंकड़े
-भारत में प्रति मिनट सरवाइकल कैंसर से एक एक महिला की मृत्यु
-देश में प्रति मिनट दो महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का पता चलता है और एक की मौत हो जाती है।
-देश में तंबाकू की वजह से मुंह के कैंसर से प्रतिदिन 3500 लोगों की मृत्यु। वर्ष 2018 में कैंसर से कुल 7,84,921 लोगों की त।
-धुएं (बीड़ी, सिगरेट के धुएं सहित) से वर्ष 2018 में 3,17,928 लोगों की मौत।
-कैंसर से मरने वाले पुरुषों में सबसे ज्यादा 25 फीसद वजह मुंह और फेफड़ों का कैंसर। जबकि महिलाओं में सबसे ज्यादा 25 फीसद वजह मुंह और ब्रेस्ट कैंसर।

जागरूकता ही बचाव का एकमात्र उपाय
कैंसर लाइलाज नहीं, बस जागरुकता की कमी से फैल रहा है। शुरूआती चरणों में इस पर काबू करना पूरी तरह से संभव है। लेकिन इसकी जांच के लिए बायोप्सी कराने से डरना। रेडियोथेरेपी और कीमोथेरेपी को लेकर गलत धारणाओं से लोग इसके इलाज से बचते हैं। ऐसे में लापरवाही से कैंसर अंतिम चरण में पहुंच कर लाइलाज हो जाता है। शरीर में किसी गांठ, घाव या बीमारी की एक माह से ज्यादा अनदेखी न करें। तुरंत विशेषज्ञ से मिलें और कैंसर की जांच कराएं।
-डा.पियूष कुमार अग्रवाल, कैंसर विशेषज्ञ, एसआरएमएस इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंसेज

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