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पिंडदान में गया की बालू क्यों है ख़ास, जानिए यहाँ

गया की बालू से ही होता है पिंडदान

वैसे तो पिंडदान कई जगहों पर बालू व चावल को बनाकर किआ जाता है लेकिन गया में बालू से ही पिंडदान किआ जाता है। आखिर ऐसा क्यों है इसका वर्णन को वाल्मिकी जी ने रामायण में भी किया है।

पितृपक्ष की शुरुआत तो हो गई है और ये 06 अक्टूबर तक रहेंगे। इन दिनों हमारे पितर परलोक से धरती पर आते हैं और हमारा कल्याण करते हैं तभी अगर हम पिंडदान व अन्न, चावल और वस्त्र दान करते है तो उनको मोक्ष की प्राप्ति होती है। साथ ही वह हमें आशीर्वाद देकर जाते हैं।

बता दें रामायण में जब श्रीराम, लक्ष्‍मण और माता सीता पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध करने धाम पहुंचे तब वे श्राद्ध के लिए कुछ सामग्री प्राप्त करने नगर की ओर गए। उसी समय एक आकाशवाणी हुई जिसमें खा गया की पिंडदान करने का समय निकला जा रहा है। उस ही वक्त माता को अपने पिता दशरथजी जी की आत्‍मा के दर्शन हो गये, जो की उनसे पिंडदान के लिए कह रहे थे। तभी माता सीता ने पिंडदान की तैयारी की पर उनके पास दान करने को कुछ न था तभी उन्होंने बालू का पिंडदान किया।

माता सीता ने फल्‍गू नदी, वटवृक्ष, केतकी के फूलों साथ में गौ माता को साक्षी मानकर बालू का एक पिंड बनाकर फल्‍गू नदी के किनारे ही श्री दशरथजी महाराज का पिंडदान किया। यह करने से महाराज की आत्‍मा खुश हुई और सीताजी को आर्शीवाद देकर चली गई।

तभी से इस मान्‍यता की शुरुआत हुई। और गया में बालू से पिंडदान करने का आरंभ हो गया और माना  गया की बालू के पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष प्राप्त होता है।

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