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ऐसे बनाएं बॉक्सिंग में अपना करियर

दुनिया भर में लोग बॉक्सिंग के दीवाने हैं। इंटरनैशनल लेवल पर इस ग्लैमरस खेल में पैसे की कमी नहीं है। विजेंदर सिंह, मैरी कॉम, अखिल कुमार जैसे कई अच्छे बॉक्सर भारत ने दिए हैं। बॉक्सिंग बहुत पुराना गेम है। 16वीं से 18वीं सदी तक बॉक्सिंग ग्रेट ब्रिटेन में पैसों के लिए खेले जाने वाले खेल के रूप में लोकप्रिय था। हालांकि 19वीं सदी से इंग्लैंड और अमेरिका में इसे फिर से व्यवस्थित तरीके से शुरू किया गया। हमारे देश में विजेंदर सिंह, मैरी कॉम, एल. सरिता देवी, डिंको सिंह जैसे कई खिलाड़ियों ने बॉक्सिंग में धाक जमाई है। विजेंदर ने देश के लिए बॉक्सिंग में पहला ओलंपिक मेडल जीता तो फिलहाल वह WBA एशिया पसिफिक सुपर मिडलवेट चैंपियन हैं। मैरी कॉम पांच बार वर्ल्ड चैंपियन रह चुकी हैं और ओलिंपिक्स में ब्रॉन्ज मेडल भी हासिल कर चुकी हैं।

 क्या है बॉक्सिंग 

मुक्केबाजी इंग्लैंड में अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी के बीच उत्पन्न हुई थी, जो नंगे हाथों से लड़ी गई थी, जिससे यह बहुत ही क्रूर और हिंसक खेल बना।

वर्ष बाद में इस खेल को विनियमित करना शुरू कर दिया गया, विशेष रूप से क्वीनबेरी नियमों के निर्माण के साथ 1867 में। मुक्केबाजी हमेशा एक ओलंपिक खेल रही है, स्टॉकहोम में केवल 1912 ओलंपिक खेलों में न केवल उपस्थित होने के कारण, उस समय से देश में खेल पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।

वर्षों से कई मुक्केबाजी विविधताएं उभरी हैं, जिनमें से सबसे प्रसिद्ध थाई मय थाई और फ्रेंच सावेट, जो पहले से ही अपने पैरों का इस्तेमाल कर रहे हैं

बॉक्सिंग अँगूठी

मुक्केबाजी की अंगूठी आकार में चौकोर है और 4,9 और 7 मीटर के बीच की ओर होनी चाहिए। इसमें चार लोचदार स्ट्रिंग हैं, जिनमें एक्सएक्सएक्स और एक्सएएनएक्सएक्स सेंटीमीटर के बीच का व्यास है, और उन्हें अंगूठी के मैदान से 3, 5, 41 और 71 इंच के पदों पर लटका दिया जाना चाहिए।

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पदों को एक चिकनी सतह के साथ लेपित किया जाना चाहिए ताकि बॉक्सर को चोट लगी जब उनमें से एक को मारा। ओलंपिक बॉक्सिंग के नियमों में व्यावसायिक मुक्केबाजी के कुछ अंतर हैं, जो कि यह एमेच्योर मुक्केबाजी के नियमों का उपयोग करता है।

कुछ मतभेद हैं कि ओलंपिक बॉक्सिंग के लिए सिर रक्षक पहनना पड़ता है, जबकि पेशेवर में इसे पहनने के लिए निषिद्ध है। शौकिया मुक्केबाजी में, यह केवल चार राउंड तक चला जाता है क्योंकि पेशेवर 12 राउंड में जाता है।

बॉक्सिंग में दो लोग बॉक्सिंग रिंग के अंदर प्रोटेक्टिव ग्लव्स पहनकर एक-दूसरे पर नियमों के अनुसार पंच करते हैं। इसके लिए 1-3 मिनट के कुछ राउंड तय किए जाते हैं। बॉक्सिंग मैच के दौरान रिंग में बॉक्सरों के अलावा एक रेफरी भी होता है। इसमें रिजल्ट मुकाबले के अंत में जजों के दिए स्कोर के आधार पर होता है। इसके अलावा, नियम तोड़ने के कारण दूसरे बॉक्सर के डिस्क्वॉलिफाई होने या लड़ने की हालत में ना होने या उसके द्वारा टॉवल फेंककर मुकाबले से हटने पर भी बॉक्सिंग में जीत-हार का फैसला हो जाता है। ओलिंपिक्स में मुकाबले के अंत तक दोनों बॉक्सरों के पॉइंट बराबर रहने पर जज तकनीक के आधार पर विनर घोषित करते हैं। प्रफेशनल बॉक्सिंग में अगर मुकाबले के अंत तक दोनों बॉक्सर्स के पॉइंट बराबर हों तो मुकाबला ड्रॉ माना जाता है।
बॉक्सिंग मुख्यतः दो तरह की होती है: ऐमेचर और प्रफेशनल
1. ऐमेचर बॉक्सिंग: ओलिंपिक्स और कॉमनवेल्थ समेत दुनिया की तमाम इंटरनैशनल प्रतियोगिताओं में होती है।
2. प्रफेशनल बॉक्सिंग: बड़ी-बड़ी कंपनियां प्रमोटर होती हैं और दुनिया भर के अलग-अलग देशों में प्रफेशनल बॉक्सरों के बीच कॉम्पिटिशन कराती हैं। इसमें पैसा बहुत ज्यादा मिलता है। प्रफेशनल खेलनेवाले आमतौर पर एमेचर में लौट नहीं पाते, क्योंकि दोनों को खेलने का तरीका अलग होता है।

कौन बन सकता है बॉक्सर
बॉक्सिंग कोच की मानें तो एक बॉक्सर अपनी टेक्नीक, आक्रामकता, फुर्ती, मजबूती और एटिट्यूड से सफल होता है इसलिए किसी बच्चे को बॉक्सर बनाने की सोचने से पहले यह जरूर देखना चाहिए कि उसमें ये सब गुण हैं या नहीं? आक्रामकता का मतलब यह नहीं है कि बच्चा अगर रोज लड़ाई-झगड़ा करता है तो वह बहुत अच्छा बॉक्सर बनेगा। बच्चे में फुर्ती, जोश और जीत का एटिट्यूड होना जरूरी है।

कैसे पहचानें सही अकैडमी
बेहतर कोच बच्चों को सही टेक्निक बता सकता है और बेहतर तरीके से तैयारी करना सिखा सकता है। ट्रेनर या बॉक्सिंग अकैडमी वही बेहतर है जो हमेशा आपकी जरूरतों पर ध्यान दे। अगर आप थक गए हैं तो वह आपको और ट्रेनिंग के लिए मजबूर नहीं करेंगे। आपका वर्कआउट आपकी जरूरतों और क्षमताओं के हिसाब से होगा, न कि वैसा जैसा कि कोई और बॉक्सर कर रहा होगा। एक अच्छी बॉक्सिंग अकैडमी में लेटेस्ट ट्रेनिंग इक्विपमेंट्स या वर्ल्ड चैंपियन ट्रेनर का होना जरूरी नहीं है। अकैडमी की सबसे जरूरी चीज है वहां का माहौल, जिसमें आपको सॉलिड बॉक्सिंग टेक्नीक सीखने और आगे बढ़ने का मौका मिले।

अकैडमी चुनते वक्त इन बातों का भी ध्यान रखना जरूरी

दीवारों पर लगी तस्वीरें: अकैडमी की पहचान करने का सबसे आसान तरीका है उसकी दीवारें देखना। आमतौर पर बॉक्सिंग अकैडमी की दीवारों पर न्यूजपेपर की कटिंग्स, अकैडमी से लोकल और नैशनल चैंपियन बन चुके पूर्व या मौजूदा फाइटर्स की फोटो, अपकमिंग टूर्नामेंट्स और लोकल बॉक्सिंग टूर्नामेंट्स के पोस्टर लगे होते हैं। सिर्फ मोहम्मद अली, माइक टायसन, विजेंदर सिंह और मैरी कॉम के पोस्टर लगी अकैडमी से बचें क्योंकि एक अच्छी अकैडमी खुद के चैंपियंस पर ज्यादा गर्व करती है।

मालिक या हेड ट्रेनर से मुलाकात: वह अकैडमी ज्यादा बेहतर मानी जाती है जहां आप उसके मालिक या हेड ट्रेनर से सीधे मुलाकात कर सकें। इससे आपको अकैडमी चलाने वाले शख्स की पर्सनैलिटी का अंदाजा हो जाएगा। इस खेल में पर्सनैलिटी काफी अहमियत रखती है।

ट्रेनिंग सेशन देखना: आप वहां के कुछ ट्रेनिंग सेशन भी देख सकते हैं। इससे आपको आइडिया हो जाएगा कि कोच कैसे बच्चों को सिखा रहा है। अगर वहां सिर्फ अटैक सिखाया जा रहा है तो यह अकैडमी अच्छी नहीं हो सकती। बॉक्सिंग अकैडमी का काम होता है टेक्नीक को बेहतर करना।

पिता ट्रेनर, बच्चा बॉक्सर: अगर किसी अकैडमी में आपको कोई पिता अपने बच्चे को ट्रेनिंग देता मिल जाए तो समझ लीजिए कि वह अकैडमी बेस्ट है। कोई भी पिता अपने बच्चे के लिए खराब अकैडमी नहीं चुनता।

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