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The Cancer Ward: सचिव को गंभीर रोग की आशंका, अस्‍पताल में भर्ती

द कैंसर वार्ड (।।) ..राघवेन्‍द्र विक्रम सिंह

The Cancer Ward: बावजूद सारे प्रयासों के बीमारी और अस्पताल भरती की खबर आउट हो गई थी. लोग प्राइवेट वार्ड में आने शुरू हो गये थे. अब उन्हें बताया क्या जाए ? यही कि पेट में दर्द है, खत्म नहीं हो रहा है तो डाक्टर साहब ने एडमिट कर लिया है परीक्षण टेस्ट वगैरह के लिए. लोगों को संदेह हुआ कि गोलमोल बताया जा रहा है.खोजियों ने वार्ड नर्सों डाक्टरों से सब पता कर लिया. फाइल भी देख ली. दूसरे दिन किसी स्थानीय अखबार ने समाचार भी लगा दिया.’सचिव को गंभीर रोग की आशंका : अस्पताल में भरती’. रेला लग गया. पत्नी का अच्छा खासा समय जन सम्पर्क, सवाल जवाब में बीतने लगा. ‘एक बार मिला दीजिए.’ लोग जिद करते. अफसरों के साथ अंदर आ जाते. रोने भी लगते. बड़ी विषम स्थिति हो जाती. रोते.रोते कई तो यह भी कह जाते कि अब ‘के हमन क खयाल रखी साहब’. कैंसर नाम ही ऐसा था. कोई क्या करता.
THE CANCER WARD
एक आध शुभचिंतकों ने मना किया कि सर, आपरेशन तो बिल्कुल मत करवाइए. चाकू लगा कि नहीं तेजी से फैल जाएगा. दो एक किस्से भी बता जाते. एक सज्जन ने तो टाटा में बात भी कर ली. चलिए यहां से. यहां बनारस में कोई ठीक हुआ है ?

जरूरत हिम्मत बंधाने की होती है लेकिन लोग अक्सर मर्सिया, शोकगीत पढ़ने लगते हैं. सबसे खराब लगती हैं दया बेचारगी वाली निगाहें. भाई आये, उदास मुंह लटकाये. लगा रो पड़ेंगे. मैंने डांटा, जाओ मुकदमें की तारीख देखो, कुछ नहीं हुआ है. मैं लोगों से खुद बातों में माहौल हलका करता रहता, हंसी मजाक वगैरह लेकिन लोग उदास उदास बैठे रहते.

लगा कि मिजाजपुर्सी करने वाले ही बीमार बना देंगे. कोई वैद्य बताता, कोई हकीम, कोई जड़ी बूटी, कोई नेपाल काठमांडू का रास्ता बताता, तरह तरह के इलाज. आपरेशन के तो सब ही खिलाफ. मैं भी एक दिन ज्यादा ही चिंतित हुआ. सोचने भी लगा. पता नहीं क्या हो.नकारात्मकता का कुछ असर आ रहा था. आपरेशन से पहले एक दिन अकेले में मैंने पत्नी से कहा, अगर मेरी बात बिगड़ गई तो तुम और आदित्य दिल्ली चले जाना. यहां किसी सरकारी नौकरी के चक्कर में मत पड़ना. दया का पात्र नहीं बनना है. पूर्व ए डी एम स्व.रामसनेही साहब की पत्नी कई बार आ जाती थीं हमारे यहां. देखा था हमने कि अधिकारी विधवाओं पर क्या बीतती है. ‘तो आपको भरोसा नहीं है संकटमोचन पर ? कुछ भी नहीं होगा.’ अलका सिंह का आत्मविश्वास गजब का था.

दो साल से ज्यादा समय हो गया होगा जब हनुमान बाबा आये थे हमारे यहां.तब मैं वहीं सिटी मजिस्ट्रेट था. वे अवधी बोलने वाले बिना पढ़े लिखे हनुमानजी के भक्त थे.70 वर्ष अवस्था, बड़े सरल, भोलेबाबा जैसे. रात को रुक गये, एक पूजा किये. सवेरे हमारे पास बैठे. बताया दो संकट हैं, एक काट दिया है. दूसरे में थोड़ा समय है अभी. तब फिर आना पड़ेगा. ठीक है. बात एक कान से सुनी दूसरे से निकाल दी. ये बाबा लोग हैं पूजापाठ न हो तो कैसे गुजारा चले.

छह माह बाद बहराइच के अपने गांव से वापस आते हुए रात 9 बजे बाबतपुर के पास भीषण एक्सिडेंट हुआ. कार एक मोटरसाइकिल बचाने में खम्भे फिर पेड़ से टकराई. इंजन घुस आया. बाडी कोलैप्स होकर हमारे ऊपर आ गई. सौभाग्यशाली थे कि कोई चोट नहीं आई. न मुझे न ड्राइवर को. ड्राइवर ने किसी तरह गाड़ी फिर स्टार्ट की. डगमग करती रेंगती हुई कुछ किमी. चली फिर बंद हो गई. फिर एक परिचित के माध्यम से घर पहुंचे, गाड़ी खिचवाई गयी. एक्सीडेंट के दूसरे दिन पत्नी को याद आया कि हनुमान बाबा तो बता गये थे. ‘यह सब चांस की बात है’, मैंने लापरवाही से कहा. फौज में भी तो कई बार क्या कुछ हुआ था, मरते मरते बचा, वहां कौन सी पूजा हुई थी ? ‘आपको तो मानना ही नहीं है.’ अलका मैडम ने कहा.

मैं चंदौली में था तभी पेट की समस्या बढ़ने लगी थी. मुख्यमंत्री का जिला, काम का बोझ बहुत था. कलक्टर से बनती नहीं थी. वे मेरे काम काटते जाते, शासन के अधिकारियों में मौका पाते ही शिकायतें भी करते. मैं परवाह ही नहीं करता था. एक आध झटका दिया, अकल ठिकाने आ गई थी उनकी.वहां मेरी लोकप्रियता भी बहुत थी, विरोध भी था.अफसरी कम, नेतागिरी ज्यादा आ गयी थी मुझे. बहरहाल ठाकुरों का जिला, विरोध भी बड़ा स्वाभाविक था. चुनाव बाद ट्रांसफर हुआ बलिया, फिर गोरखपुर. स्वास्थ्य की स्थिति बिगड़ती जा रही थी.

आखिरकार लखनऊ में शशांक शेखर साहब के सामने जाकर खड़ा हुआ. समस्या कही.बताया कि गोरखपुर में हूं. बनारस में था,डाक्टर देख रहे थे. गोरखपुर में मुश्किल हो रही है. गार्जियन की तरह डांटा, ‘पहले क्यों नहीं आये ? तुम फौजियों में यही समस्या है. जब बात सर पर आ जाये, तब बताते हो.’ वे खुद भी फौजी थे. मैंने उन्हें बलिया के विधायक भरत भाई का लिखा कागज, संकोच के साथ पकड़ाया.फिर एक सप्ताह में ही बनारस आ गया. पेट में दर्द भी रहने लगा था और वजन गिर रहा था. कोई इलाज काम नहीं कर रहा था. एक दिन अवधेश सिंह आये थे.कहा कि सप्ताह बाद वे गांव से ही माघ मेले में जाएंगे. बाबा के कैम्प में रहेंगे.मुझे याद आ गया. वे ही तो हनुमान बाबा को ले आये थे. मैंने उनसे कहा कि बाबा से पूंछना कि हमारी इस समस्या का क्या समाधान है. बहरहाल वे चले गये. दो चार दिनों में यहां कैंसर पता चला और कारवाई स्पेशल गेयर में चलने लगी.

आपरेशन हुआ. होश आया. रात सोते जागते बीती. दूसरे दिन पत्नी ने बताया कि अवधेश सिंह आये हैंं. कहा कि कल ही मैं पहुंचा था बाबा के पास . आपको बताया. उन्हें याद आ गया वो कैप्टन साहब ? जी. ध्यान किया, बताया कि उन्हें तो असाध्य रोग हो गया है.इस समय तो आपरेशन के लिए ले जाए जा रहे हैंं. आपरेशन ? वो त़ो चल फिर रहे थे. नहीं, संकट था उन पर फिर कुछ पहले की तांत्रिक क्रियाओं के प्रभाव से स्थित ज्यादा बिगड़ रही है.फिर वो स्वयं व उनके दो शिष्य बैठ गये जाप, हवन पर. कहा है चिंता न करें अस्पताल से आ जाएं तो मैं या रामदास घर पर आएंगे, सब उपाय करेंगे.

   यह इन शक्तियों से मेरा पहला स्पर्श था. वे कैसे जान गये वहां प्रयाग में कि मैं आपरेशन के लिए ले जाया जा रहा हूं ? अवधेश को तो खुद नहीं मालूम था. ये कैसे हो सकता है ? कमाल है.

अस्पताल में ही एक दिन असी घाटवाले बाबा जी आये. बोले कि आप स्वस्थ हो जाएंगे तो मां कामाख्या के यहां चलना है. वे प्रतिवर्ष जाते हैं. एक बार नगर निगम के एक अधिकारी के साथ उनके यहां चला गया था.कुछ समस्या थी उनकी. वे घाट पर बैठते थे. उन्होंने तब कहा था कि यह मांस मदिरा का सेवन आपकी प्रकृति के विपरीत है.मैंने सफाई दी, कहा कि कभीकभार की बात है. नहीं,आप मन से सात्विक वृत्ति के हैं.जल्दी ही देवी माता कामाख्या यह सब आपसे छुड़ाने वाली हैं.यह भी कहा कि धर्म आध्यात्म आपकी प्रवृत्ति हो जाएगी. पता नहीं, मैंने सोचा, अभी तो इसकी दूर दूर तक संभावना नहीं दिखती.

आपरेशन के बाद बहुत शीघ्र ही 15 दिनों में ही घर आ गया. सीमित ही लेकिन चलना फिरना भी शुरू हुआ.वहां बी एच यू में डाक्टरों में बड़ी बहस चली.  डा. शुक्ला ने उस चर्चा में रेडियोथेरपी से मना कर दिया. पहला कारण यह बताया कि प्रभावित भाग तो काफी मारजिन लेकर काट दिये गये हैं तो थेरेपी किस भाग पर की जाएगी ? दूसरा यह कि कैप्टेन साहब की इतनी अच्छी पर्सनैलिटी खराब हो जाएगी. वाह ! बहरहाल, जवाब सुनकर मजा आ गया.अब किमियोथेरेपी इंजेक्शन व दवा से की जाएगी.जाहिर है  मंहगी दवाइयां, मंहगे इंजेक्शन.
RAGHVENDRA VIKRAM SINGH
फिर अपने बनारस के एक प्रमुख ज्योतिषी चंद्रमौलि उपाध्याय जी जो डा. महेंद्र के अभिन्न मित्र भी थे,से मुलाकात हुई. महेंद्र उन्हें घर ही लेकर आ गये थे.पहले भी मुलाकात थी और उनके लैपटॉप में हमारा जन्मचक्र फीड भी  था. वे हमारी कुण्डली पहले एक बार देख भी चुके थे.मेरी उनसे बड़ी चर्चा बहस भी हुई थी, उनके एक प्रेडिक्शन या भविष्यवाणी पर मैंने उनसे बड़ी बहस की थी. जब महेन्द्र ने पहले पहल मिल वाया था तो महेंद्र ने तब ही यह कहा भी था कि यार मैं इस सब पर ज्यादा विश्वास नहीं करता. तू चाह त एन्है देखाव आपन कुण्डली जनमपत्री.लेकिन मुझे ज्योतिष विज्ञान आश्चर्यचकित करता रहा है. वाराणसी से तत्समय मेरे स्थानांतरण की उनकी उस भविष्यवाणी ने, जो अक्षरशः सत्य हुई थी, हमें भौचक्का कर दिया था. जब कि स्थानांतरण का कोई माहौल ही नहीं था. जब आया तो रोके नहीं रुका. यहां उनसे आज इस नये घटनाक्रम पर बहस होनी थी कि इस इतनी गंभीर बीमारी की भविष्यवाणी क्यों नहीं हो पाई ?

शेष अगले भाग में

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