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The Cancer Ward: कैंसर का नाम ही ऐसा है कि दिल बैठ जाता है

द कैंसर वार्ड (।।।) . राघवेन्‍द्र विक्रम सिंह

 The Cancer Ward:…. चंद्रमौलि उपाध्याय जी को इस बात का अफसोस था कि वे इस बीमारी को पकड़ क्यों नहीं सके. जन्मपत्री फिर देखी कहा कि इस समय काल में कष्ट तो है लेकिन यह जीवन-मृत्यु का प्रश्न बन जाएगा, यह समझ में नहीं आ रहा है. उन्होंने कहा कि अभी बी एच यू में राष्ट्रीय ज्योतिष कांनफरेंस होने जा रही है उसमें यह जन्मचक्र रखा जाएगा और इसपर अवश्य चर्चा होगी. वाह ! क्या बात है.
THE CANCER WARD
अस्पताल से घर वापस आने पर बड़ा सकून मिला. कैंसर की एक बड़ी समस्या इसके रिलैप्स होने अर्थात पुनः उभर आने की होती है. आधे मामलों में ऐसा हो भी जाता है. मस्तिष्क के एक कोने में यह भय कहीं न कहीं लाख भुलावा देने के बावजूद बना रहता है. लोग भाग्यवादी हो जाते हैं. दूसरे दिन हनुमान बाबा जी के शिष्य बाबा रामदास आये. रात में रुके, अनुष्ठान किया. बहुत रिलीफ सी महसूस हुई. दूसरे दिन वापस चले गये. कई शुभेच्छु लोग जिनकी थ्योरी यह थी कि आपरेशन के बाद कैंसर तेजी से फैलता है बड़े चिंतित भी थे.एक हमारे परिचित सज्जन ने बगल के गांव के एक ज्ञानी ज्योतिषी जी के बारे में बताया और कहा चलिए वहां चला जाए देखें, वे क्या कहते हैं.

दूसरे दिन हमलोगों का काफिला उन नए ज्योतिषी जी के यहां चला. एक घंटे में उनके गांव पहुंचे. गांव का बड़ा सा घर. सामने मैदान जैसा खलिहान. एक कार कुछ मोटरसाकिलें खड़ी थीं.बरामदे में  तखत पर ज्योतिषी जी थे. लम्बे, किसान जैसा शरीर,65 वर्ष लगभग. और सामने कई लोग चारपाइयों पर बैठे थे. हमलोग भी प्रणाम् कर निकट की ही दो चारपाइयों पर जम गये. जल्दी ही खाली होकर हमलोगों की ओर मुखातिब हुए. फिर हमारी कुण्डली बांचने लगे. फिर हमारी ओर देखा. कहा कि कुण्डली ठीक नहीं मालूम पड़ रही है. क्यों ? मैं आश्चर्यचकित हुआ. ऐसा तो किसी ने नहीं कहा था.

‘समस्या यह है कि जन्मचक्र के मुताबिक इस समय आपको तो मृत्यु के मुख में होना चाहिए या मृत्युतुल्य कष्ट होना चाहिए और आप तो चलते हुए हमारे यहां आ रहे हैं.’ उन्होंने कहा.

हमारे साथ आये सज्जन ने चहक कर उन्हें सारी बात बताई. वे भी चौंके फिर गहराई से जन्मचक्र का निरीक्षण करने लगे. मैंने पूंछा महाराज ये बताएं कि फिर से इस बीमारी के उभरने की आशंका तो नहीं है. उन्होंने मुझे निकट बुलाया. आप जन्मचक्र, ज्योतिष तो समझते ही होंगे. मुझे अर्थपूर्ण निगाह से देखते हुए उन्होंने कहा कि ज्योतिष में रुचि आपके जन्मचक्र में है, इसलिए कह रहा हूं. वाह ! ये ज्योतिषी लोग जानते हैं कि कैसे प्रार्थीगण को आश्चर्यचकित करते रहना है. फिर उन्होंने चक्र पर इंगित किया, ‘देखिये, ये आठवां स्थान देखिये, बृष राशि है.यहां. अलग अलग विपरीत दिशाओं से आ रहे शनि व राहु की यहां युति हो रही है. युति का दिवस यह है तो इस समय शरीर से बड़ा रक्तस्राव होना चाहिए. मृत्युतुल्य कष्ट का काल था यह..आपरेशन की तिथि गणना में वे बस तीन दिन ही आउट थे.

बताया कि युति के बाद दोनों ग्रह इस स्थान में क्रास होकर फिर दूर जाने लगते है वैसे ही जैसे किसी जंकशन पर आ रही दो ट्रेनें पहले क्रास करती हैं फिर दूर जाने लगती हैं. अर्थात यदि जीवन बच गया है तो अब कष्ट कम होना प्रारंभ हो जाएगा और रक्षा होगी. आप सामने ही तो बैठे हैं तो स्पष्ट है कि मृत्यु काल निकल चुका है.अब समस्या दूर ही होती जा रही है. फिर दुबारा इस बीमारी के उभरने की कहीं कोई आशंका नहीं है. निश्चिंत रहिये. वैसे यह तो लग ही रहा है साहब कि आप पर अपने पूर्वजों का, हनुमानजी का, बाबा विश्वनाथ का बड़ा आशीर्वाद है.

तीन साल पहले चंद्रमौलि उपाध्याय जी ने वाराणसी नगर निगम से हमारे ट्रांसफर की बड़ी सटीक भविष्यवाणी की थी. मैंने बचने का प्रयास किया.सोचा कि अतिक्रमण अभियान में ही मेरी समस्या खड़ी हो सकती है. मैंने अस्थायी रूप से अपने को उस कार्य से अलग कर लिया.लेकिन समय पर एक घटना ऐसी हुई कि जिसका ब्लेम मेरे ऊपर अनायास ही आ गया. ट्रांसफर आदेश आया. बाबा हरदेव सिंह के लाख प्रयास किया, बड़ी सफाई दी लेकिन सब कुछ के बाद भी स्थानांतरण रुका नहीं. मुझे बरेली जाना ही पड़ा. फिर चंद्रमौलि जी ने ही यह भी कहा तीन महीनें में वापस भी आ जाएंगे बरेली से. तीन महीने से थोड़ा पहले बरेली में उनका टेलीफोन आया कि किसी से भी कह दे, आप वापस आ जाएंगे.

मैंने एक नेता जी से कह देने की औपचारिकता भर निभाई और एक सप्ताह में फिर बनारस आ गया.बड़ा गजब का घटनाक्रम था. वही चंद्रमौलि जी इस बार इतनी बड़ी बीमारी बता सकने में चूक गये थे. और यहां इस अनजाने से गांव के एक पंडित जी एक प्राध्यापक के समान जन्मचक्र पर कैंसर जैसी बीमारी के ज्योतिषीय कारणों को मुझे ग्रहों की गतियों के माध्यम से समझा रहे थे.

घर पर ही एक दिन कलाम आये थे. ‘ भैया, आपका मामला सुनने के बाद डर सा लग रहा है. हमारी भी कुछ वक्त से पेट की समस्या चल रही है. डाक्टर एंडोस्कोपी से अंदर आंत में देखना चाहते हैं. भैया, मैंने मनाकर दिया उन सब को कि यह सब क्या बकवास है. डाक्टरों का क्या ठीक, न जाने क्या क्या निकाल दें. कलाम कैण्ट से विधायक थे. बहुत मजबूत, माफिया टाइप. जब मैं सिटी मजिस्ट्रेट था तो दो एक बार उनसे मेरा जबरदस्त मुचैटा हुआ था. वह झड़प मीडिया में भी आ गई थी. कलाम तब मुझे धमकी देते घूम रहे थे. बनारस के ठाकुर माफियागण अनायास ही मेरे शुभचिंतक बनकर मेरा जिंदाबाद करने लगे थे. कुछ दिनों में मैं प्रोमोट होकर चंदौली सीडीओ हो कर चला गया था. लेकिन कलाम ने कोई मलाल नहीं किया फिर रिश्ता कायम किया और मुझे बड़े भाई की तरह सम्मान देने लगे.

कुछ दिन में घूम फिर कर मैं वाराणसी विकास प्राधिकरण में आ गया. अक्सर कलाम आने लगे. ‘भैया, आपके यहां आने के बाद अपनी बिरादरी में हमारी इज्जत और बढ़ गई है.मुसलमानों के छोटे छोटे काम होते हैं. लोग कहते हैं साहब कलाम का कहा टालते नहीं हैं. मैं देखता हूं कि आप तो सभी आम लोगों से भी बड़ी इज्जत से बात करते हैं. हमारे लोग लोग समझते है कि विधायक जी ने भेजा है इसलिए खयाल कर रहे हैं’. उन्हें पता था कि हमारे ननिहाल जौनपुर में जमीन का कोई विवाद चल रहा है जिसके कारण बनारस में रहने की मजबूरी हो जा रही है. वे अक्सर कहते भी थे कि भैया मुझे अपना कोई  टेढ़ा काम दीजिएगा,निपटा दूंगा..चलता हूं एक दिन मड़ियाहूं जौनपर आपके साथ. आसान काम तो सब कर ले जाते है.

मुझे उस दिन कलाम की पेट की बीमारी की बात सुनकर बड़े भाई जैसी चिंता हुई. मैंने कहा डाक्टर जैन से मिलो आज ही. एण्डोस्कोपी कराओ. अगर कुछ है तो आंख बंद करने से खतम नहीं हो जाएगा. फिर भी कलाम ने एक महीना और लगा दिया. समस्या और बढ़ी तब टेस्ट कराने मुंबई गये. वहां से टेलीफोन किया. कमजोर सी आवाज में कहा, भइया, वही आप वाली समस्या है.

ओह ! कहां है किस भाग में ?
छोटी आंत में है. आपरेशन ही करना होगा. जल्दी करा रहा हूं.
ठीक है.
आपरेशन हुआ,कलाम बनारस वापस आये. मैं देखने गया. कमजोर शरीर. कमजोर आवाज. मैंने तो उसके तेवर देखे थे, उसे असहाय सा देखना बड़ा अफसोसनाक था.
 भैया, दुबारा तो कुछ नहीं हुआ न आपको ? 
नहीं यार. होगा भी नहीं. न हमें न तुम्हें.
आप को पहले जैसे देख कर बड़ा अच्छा लग रहा है सर.
‘ तुम भी ठीक हो जाओ. बसस्टैंड के ठेके पर फिर मुचैटा होगा न हमारा तुम्हारा.’ हंसते हंसते बुरा हाल हो गया उसका. ‘वाह भैया वाह ! आप कोई बात भूलते नहीं हैं.’

लेकिन स्वस्थ होने की जल्दी में  बदपरहेजी शुरू कर दी कलाम ने. मीट घी तेल खाना मना था लेकिन वह नहीं माना. परिवार की भी नहीं सुनी. छह महीने में फिर मुंबई भागना पड़ा. फिर आपरेशन.आपरेशन के बाद पीलिया. मोबाइल पर बात हुई. जीवन से निराश. ढाढस दिया. आओ बैठेंगे.
फिर मौत की खबर आई. बाडी आई. मैं उसके घर गया. उसे बर्फ की सिल्ली पर लिटाया गया था. पूरा शरीर गल गया था. ढांचा मात्र अवशेष था. जनाजा उठा तो कब्रिस्तान तक लाखों की भीड़. ऐसा जनाजा बनारस में किसी का नहीं उठा था.

दूसरी स्मृति विवेक सिंह की है. विवेक की स्मृति में वरुणापार के मिनी स्टेडियम का नामकरण किया गया है. विवेक अंतर्राष्ट्रीय हाकी खिलाड़ी रहा था.सेंटर हाफ पोजीशन का मशहूर प्लेयर. आदित्य के जिम में हम लोग लगभग रोज मिलते थे. उसका यूरिनरी ब्लैडर का कैंसर का आफरेशन हो चुका था. मान भी लिया गया था कि बात खत्म हो चुकी है. कोई खतरा अब नहीं है. लेकिन करीब तीन साल बाद फिर समस्या खड़ी होने लगी. तब मुझे लगता था कि कलाम और विवेक जैसे हमारे हरावल दस्ते हैं. हमारे अगले मोर्चे हैं. अगर ये मोर्चे टूटे तो मैं फ्रंट पर आ जाऊंगा. कलाम की मौत का मातम हमारे यहां भी था. और अब विवेक. विवेक के इलाज के लिए सरकार से गुहार कराई. अखबारों के दफ्तरों में अपीलें छपवाने गया. जन सहयोग के प्रयास किये. वह लड़ाई विवेक की नहीं जैसे मेरी थी. मेरी हिम्मत नहीं पड़ती थी कि उसे देखने घर जाऊं. फिर एक दिन पत्नी, पुत्र, पिता, परिवार, मित्रों को विदा देता हुआ विवेक चला गया.

मेरे दोनों मोर्चे टूट चुके थे. अब मैं फ्रंट पर था. डा. शुक्ला जी ने कैंसर मार्कर व सभी टेस्ट कराये. सब कुछ सामान्य था. सब सामान्य रहा, बस कभी कभार के तनावों के साथ. सोचता हूं कि कलाम ने अगर बेवजह की घबराहट में लापरवाही न की होती, डाक्टरों की सलाह मानी होती तो वह आज भी हमारे बीच होता, बनारस पूर्वांचल की राजनीति में एक सशक्त भूमिका का निर्वहन करता हुआ. विवेक ने यह न मान लिया होता कि अब दुबारा दिखाने की जरूरत ही नहीं और जैसा कि नियम है, हर छह महीने में टेस्ट कराता रहता तो कैंसर का फिर उभर आना निश्चित ही समय से पकड़ में आ जाता.आज वह अपने पिता जी की तरह बनारस व प्रदेश से नये हाकी खिलाड़ियों की पौध निकाल रहा होता. दोनों से वे लापरवाहियां हो गई जिनसे बचा जा सकता था.

कैंसर, नाम ही ऐसा है कि दिल बैठ जाता है परिवार के लोगों का विलाप रहा सहा पूरा कर देता है. देखा गया है कि पारिवारिक पंचायती राज में विलंब होता जाता है और बीमारी अलग बढ़ती जाती है. इलाज मंहगा है, पैसे की व्यवस्था भी समय लेती है. ऐसा ही एक मामला तब आया था जब मैं बरेली मैं डी एम था. सुबह नौ बजे के मिलने वालों में एक बच्ची मिलने आयी थी. पिता प्राइवेट स्कूल में टीचर थे. कैंसर हो गया था तीन लाख का खर्च था. उनकी व्यवस्था कुल मिलाकर एक लाख की ही हो पाई थी.  आयुष्मान योजना तब नहीं आई थी.तीन लाख बड़ी धनराशि थी. मेंने मेडिकल कालेज बात की.

वे  पचास हजार छोड़ने पर सहमत हुए. फिर मैंने बरेली के उद्योगपति शकील कुरैशी से बात की. शकील ने उसी दिन मेडिकल कालेज के खाते में ढाई लाख ट्रांसफर करा दिये. दूसरे दिन उस बच्ची व उसकी माता को बताया कि जाओ मेडिकल कालेज व्यवस्था हो गई है.आपरेशन सफल रहा. इसी तरह ‘बैल कोल्हू’ के घनश्याम खण्डेलवाल का भी सहयोग रहता रहा. बरेली में मैंने देखा था कि बड़ी अच्छी परंपराएं रहीं हैं, शकील, घनश्याम जी जैसे लोग हैं जो सहायता में आगे आते रहते हैं.
RAGHVENDRA VIKRAM SINGH
जहां तक मेरा सवाल है तब से लेकर आज 17 साल तक का सफर पूरा हुआ और बदस्तूर चल रहा है. इस यात्रा में ईश्वर आध्यात्म धर्म दर्शन के प्रति हमारे विचारों में क्रमशः  परिवर्तन व परिष्कार भी होता चला गया है. भगवत्ता से आविष्ट होने का जो नया सा एहसास है, आत्मा की गहराइयों में जो नई परिभाषा प्रकट हो रही है उस पर फिर कभी.
बाबा संकटमोचन की जय !
( आपरेशन के बाद  मां कामाख्या मंदिर गौहाटी में )

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