चुनावी दौर में सोशल मीडिया ( social media ) गिरगिट के प्रकार नजर आता है एक स्लाइड में कुछ रंग और दूसरे स्लाइड में कुछ और रंग देखने को नजर आते हैं आजकल किसी के दिमाग में अपना नजरिया बैठाना हो तो सोशल मीडिया ( social media ) से अच्छी जगह कोई हो ही नहीं सकती, राजनैतिक पार्टियों के आईटी सेल से ज्यादा सोशल मीडिया का यह इस्तेमाल छोटे-बड़े न्यूज़ चैनल किया करते हैं एक व्यक्ति ने कहा कि अपनी खबर अगर बड़े अख़बार में पैसे देकर निकालोगे तब भी लोग अगले दिन रद्दी में ही रख देंगे लेकिन अगर सोशल मीडिया पर पैसा लगाकर उसका मुद्दा बना दोगे तो अखबार तो मुफ्त में खबर निकालेंगे ही निकालेंगे साथ ही खबर का असर देखने को जरूर मिलेगा।

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Rewrite वाली पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखते ही मुझको सोशल मीडिया social media के हाव भाव का अंदाजा लगने लगा, कैसे एक मामूली सी बात को मुद्दा बनाकर रातो रात ट्रेंड कर दिया जाता है और कैसे इस काम से पैसा बना लिया जाता है, राजनीतिक पार्टियों के साथ-साथ छोटे-छोटे न्यूज़ पोर्टल भी इसी लाइन में लगे हुए और बारी बारी से अपनी रोटी का इंतजाम करते हैं,सब ने कोई ना कोई बड़ा चेहरा पकड़ रखा है बड़ा चेहरा जैसे बड़े राजनीतिक पार्टी के मुखिया का, उनके नाम से फैन पेज और ग्रुप्स बनाकर यह लाखों लोगों को बटोरते है जो चुनावी दौर में तो राजनीतिक पार्टियों को सहयोग देते हैं और बाकी समय सोशल मीडिया से ट्रैफिक बटोरने का काम करते हैं।

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बड़े न्यूज़ portals को Google News शरण दे देता है लेकिन छोटे चैनलों को अपना इंतजाम सोशल मीडिया से ही करना पड़ता है कुछ एक दूसरे में आग लगाकर अपना धंधा चलाते हैं तो कुछ उन राजनीतिक पार्टियों के डोनेशन का इंतजार करते हैं जिनका वो पेज या ग्रुप चला रहे है। अगर आपको यह बात पढ़ कर हैरानी हो रही है तो एक बार उस ग्रुप के एडमिन के बारे में जरूर तलाशें जिसके ग्रुप में आप जुड़े हुए हैं। 95 प्रतिशत से ज्यादा तेज और ग्रुप आपको किसी ना किसी मीडिया चैनल के ही मिलेंगे.

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अब बात करते हैं चुनावी दौर में यह social media पर कैसे प्रभाव डालते हैं? 

जब चुनाव का वक्त आता है तो सोशल टाइटल का इस्तेमाल जोरों शोरों से किया जाने लगता है जिससे कंटेंट को मैनिपुलेट किया जा सके, social title एक customised title होता है, आपने अक्सर देखा होगा की खबर के टाइटल में कुछ और लिखा होता है लेकिन जब हम उस पर क्लिक करके पहुंचते हैं तो अंदर कुछ और ही मिलता है, इसकी मदद से चुनाव के वक्त अलग-अलग ग्रुपों में एक ही कंटेंट को अलग-अलग तरीकों से पेश कर लाइक और शेयर बटोरे जाते हैं, जिसका बड़ा फायदा राजनीतिक दलों को मिलता है साथ ही यह भी पैसे कमा लेते हैं.

सोशल मीडिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर काम करता है यानी वह आपके सामने वही परोसेगा जिसको देखने के लिए आप इच्छुक हो, एक बार आपने अगर कुछ like कर दिया तो यह समझ जाता है कि आप कि रुचि इसी में है, वह आपको दिन भर उसी से मिलती-जुलती चीजें दिखाएगा जिसको बार-बार देखने से आपके विचार बदलने लगेंगे पर आप उस नज़रिए को लेकर अपने साथ चलने लगेंगे.

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इसलिए जब भी अपना खाली समय सोशल मीडिया पर बिताएं तो सोच समझ के प्रतिक्रिया दें याद रखें आपकी मति फेर कोई नोट बना रहा है।

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