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Rohilkhand University Research: प्रदूषण नहीं किसानों की कमाई का जरिया बनेगी पराली

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Research By Rohilkhand University Studnts: वायु प्रदूषण और स्मॉग के लिए जिस पराली को जिम्मेदार बताया जा रहा है, उसी पराली को रुहेलखंड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और चार छात्रों ने कमाई का जरिया बनाने की तकनीक बना ली। इस तकनीक से बिना प्रदूषण फैलाए पराली का निस्तारण भी होगा और कोयला भी मिलेगा। यह तकनीक विश्वकर्मा अवार्ड के लिए नामित टॉप 10 तकनीकों में शामिल है। इसका प्रोटोटाइप तैयार कर प्रयोग भी सफलतापूर्वक गया गया है। प्रोफेसर का कहना है कि कोई भी किसान आसानी से इसे घर में ही लगा सकता है। यानी इस तकनीक से जो किसान जितनी अधिक पराली जलाएगा उसक आमदनी उतनी अधिक होगी। शासन-प्रशासन से कार्रवाई का कोई डर भी नहीं होगा।

पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में पराली जलाने के कारण काफी वायु प्रदूषण होता है। वातावरण में सूक्ष्म कणों की मौजूदगी के कारण दिल्ली, एनसीआर सहित उत्तर प्रदेश भी स्मॉग की चपेट में आ जाता है। रुहेलखंड यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अंकित वार्षणेय की निर्देश में बीटेक छात्र सक्षम, प्रवीण कुमार, संदीप राजपूत और शोभित सिंह ने पराली को जलाकर कोयला बनाने की तकनीक बनाई। डॉ. अंकित ने बताया कि इस तकनीक में पराली को पूरी तरह से नहीं जलाया जाता है। इसकी सेमी बर्निंग की जाती है। जो धुंआ निकलता है उसको चिमनी के जरिए फिल्टरेशन प्लांट में ले जाते हैं। इसमें 40000 वोल्ट के नेगेटिव चार्ज से धुंए को गुजारा जाता है। इस दौरान जो भी कार्बन कण होते हैं वह पाजीटिव चार्ज प्लेट पर चिपक जाता है। इसकी वजह से जो धुंआ बाहर जाता है वह पर्यावरण को बिल्कुल भी नुकसान नहीं पहुंचाता है।

पराली से बनाए जाएंगे चारकोल के केक

अंकित ने बताया कि पराली की सेमी बर्निंग करने के बाद उसमें चारकोल बच जाता है। इस चारकोल को बाइंडर की मदद से चारकोल केक में बदल दिया जाता है। इस चारकोल केक को 30-35 रुपये किलो बाजार में बेचा जा सकता है या फिर इसका घर में ईंधन के रुप में प्रयोग किया जा सकता है। इसको जलाने से धुंआ नहीं निकलता है।

विश्वकर्मा अवार्ड के लिए चिन्‍हित हुआ प्रोजेक्‍ट

यूनिवर्सिटी के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के छात्रों और प्रोफेसर की ओर से तैयार यह तकनीक विश्वकर्मा अवार्ड के लिए चयनित हुई है। टेक्‍नीकल एजुकेशन क्वालिटी इंप्रूवमेंट प्रोग्राम (टेकिप-3) के तहत इस तकनीक को विकसित किया गया है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से विश्वकर्मा अवार्ड के लिए पूरे देश के इंजीनियरिंग संस्थानों से आवेदन मांगे गए थे। इसमें रुहेलखंड विवि की यह तकनीक चौथे चरण में पहुंच गई है। अब टॉप 10 तकनीकों में से टॉप थ्री को विश्वकर्मा अवार्ड मिलेगा।

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टेकिप-3 के तहत यह तकनीक विकसित की गई है। इसमें पराली जलाने से वायु प्रदूषण भी नहीं फैलेगा और किसान इसकी मदद से चारकोल केक तैयार कर बेच सकेंगे। विश्वकर्मा अवार्ड के लिए यह तकनीक टॉप-10 में पहुंच चुकी है। इसको किसान मात्र 5 हजार रुपये खर्च कर अपने लगा लगा सकते हैं।

डॉ. मनोज कुमार, हेड, मेकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग

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