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केरल का चिकित्सा मॉडल वामपंथियों ने नहीं सन 1860 में हिन्दू महाराजा अइल्यम तिरुनल ने बनाया था

 

केरल ने जिस कुशलता से बीमार लोगों, अस्पतालों, घरबंदी आदि का प्रबंधन किया वह आंकड़ों से लेकर धरातल तक पर आसानी से देखा जा सकता है. स्थानीय स्तर पर जिस तरह से ग्रामीण और शहरी निकायों ने लोगों को सचेत किया, कोविड-19 से प्रभावित लोगों को अस्पताल और अन्यत्र सघन निगरानी में रखा उसे देखकर पंचायती राज कानून की सफलता पर मुग्ध हुआ जा सकता है.

केरल की तत्कालीन सरकार ने तिहत्तरवें और चौहत्तरवें संविधान संशोधन के तुरंत बाद ही स्थानीय निकायों का गठन कर उन्हें आर्थिक, कार्यकारी और प्रशासनिक स्वायत्तता दे दी थी. उसके परिणाम संकट की इस घड़ी में भी दिख रहे हैं. स्थानीय निकाय और अस्पताल इस संकट काल में राज्य के साथ खड़े हुए, तो यह एक मजबूत तंत्र की सफलता भी है.

देश के अन्य भागों की तरह केरल के इतिहास में स्वास्थ्य संबंधी बड़ी दुर्घटनाएं न के बराबर देखने को मिलती है. जबकि यहां की एक बड़ी आबादी रोजगार के सिलसिले में बाहर रहते हुए नई-नई तरह की बीमारियों के संपर्क में आने की आशंकाओं के दायरे में रहती है. जहां देश के दूसरे राज्य, स्वास्थ्य संबंधी संकट के समय कमजोर तंत्र से जूझते रहते हैं वहीं, केरल मजबूती से सही मोर्चों पर डटा रहता है.

आज इस राज्य की स्वास्थ्य संबंधी सफलताओं को एक सुसंगठित तंत्र के सुचारु रूप से काम करने से ज्यादा वर्तमान सरकार के कुशल प्रशासन के नज़रिये से देखा जा रहा है. निश्चित रूप से सरकार और उसकी मशीनरी ने सबकुछ सुचारु रूप से लागू कर राज्य को देश भर में सबसे आगे कर दिया है. और सत्ताधारी दल और उनके समर्थकों का केरल मॉडल का ज़ोर-शोर से प्रचार-प्रसार करना संसदीय राजनीति में स्वाभाविक प्रक्रिया का हिस्सा है. लेकिन इसके पीछे जो छिप जा रहा है उसे भी देखे जाने की जरूरत है

“मेरी प्रजा के हर वर्ग में अच्छी चिकित्सा सुविधा की पहुंच हो यह मेरी चरम अभिलाषा है. क्योंकि यह ऐसी नेमत है जो चाहकर भी व्यक्ति की पहुंच से बाहर है. इसलिए राज्य का दायित्व है कि इस ओर कदम उठाए जाएं!”

सन 1860 में महाराजा ऑफ त्रावणकोर के इन शब्दों से इस लेख  का उद्देश्य बहुत जल्द स्पष्ट हो जाएगा.

वहां तक पहुंचने से पहले देश के ऐसे राज्य की ओर रुख करते हैं जिसे आज एक ‘मॉडल’ की तरह देखा जा रहा है. कोरोना वायरस से प्रभावी ढंग से लड़ने के लिए केरल की खूब प्रशंसा हो रही है, होनी भी चाहिए क्योंकि इस राज्य ने जिस तरह से स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम किया है वह किसी के लिए भी अनुकरणीय है.

केरल में हमेशा से वाम दलों की सरकारें ही नहीं रही और यहां का वह जनसरोकारी ढांचा भी एक दिन में निर्मित नहीं हुआ. इस राज्य में एक मजबूत व सक्षम स्वास्थ्य संरचना खड़ी करने में न तो वाम दलों की ही अकेली भूमिका है और न ही अन्य किसी दल की.

वामपंथी दल, देश के अन्य राज्यों जैसे त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक सत्ता में रहे लेकिन वहां की स्वास्थ्य संबंधी दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है.

बाकी दलों की सरकारें देश के अन्य राज्यों में रही हैं जिनकी स्वास्थ्य के मोर्चे पर बड़ी-बड़ी विफलताओं की गिनती तक नहीं की जा सकती.

केरल के वैद्यरत्नम आयुर्वेद म्यूजियम में रखा चित्र

लोक-कल्याणकारी राज्य के रूप में केरल की स्थिति के लिए वर्तमान राजनीति अपनी पीठ ठोंक सकती है. आजादी के बाद के जनोन्मुख सुधारों में निश्चित रूप से उसकी भूमिका है. लेकिन यहां ठहरकर एक प्रश्न करने की जरूरत है कि क्या इसके लिए जरूरी नीतियां शून्य में बन सकती हैं और जहां भी वे शून्य में बनी हैं उनका क्या हश्र हुआ है?

अब त्रावणकोर के दीवान नागमैय्या के विवरणों में से महाराजा अइल्यम तिरुनल के उपरोक्त कथन पर चलते हैं.

एक महाराजा उस समय अपने राज्य के नागरिकों की चिकित्सा सुविधाओं की बात करता है जब ऐसी चेतना भी भारत में नहीं आयी थी.

शिक्षा संबंधी चिंता बड़ौदा और मैसूर जैसे रजवाड़ों में भी देखने को मिलती है. प्रजा की स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों के प्रति सजगता के कुछ परिणाम तब से ही इन जगहों पर दिखने लगे.

सन 1865 में त्रावणकोर राज्य की ओर से पट्टम घोषणापत्र जारी किया गया. इसे त्रावणकोर का मैग्नाकार्टा भी कहा जाता है. इसने राज्य के किसानों को भूमि के सम्पूर्ण अधिकार दे दिए और अब वे उस भूमि को खरीद-बेच सकते थे. इसने राजघराने को जमींदारों के संभावित विद्रोह से मुक्त कर दिया साथ ही निचली जातियों जैसे कि एझवा में समृद्धि लाने में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई. इसके अतिरिक्त इससे कृषि योग्य भूमि का विस्तार भी हुआ और अंग्रेजों द्वारा बागानी कृषि की शुरुआत की गई. कृषि के वाणिज्यीकरण की शुरुआत भी यहां पर दिखती है. जोतें छोटी हुईं मगर मामूली कामों से अर्जित धन से जमीन खरीदने वालों की संख्या बढ़ गयी. यह प्रक्रिया बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों में काफी तेज़ी से बढ़ी. इसे सन 1931 की भारत की जनगणना के त्रावणकोर संबंधी विवरण में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है. उसमें जोतों के छोटे होने को शिकायत की तरह दर्ज किया गया है.

वर्तमान केरल के मजबूत लोक कल्याणकारी तंत्र को इसके पूर्वज रजवाड़ों की जन पक्षधर नीतियों की ओर देखे बिना समझ पाना संभव नहीं है. ऐतिहासिक तथ्य ये बताते हैं कि आज के केरल की उपलब्धियों को उन नीतियों से काटकर नहीं देखा जा सकता जो यहां पहली साम्यवादी सरकार बनने के दशकों पहले से चली आ रही थीं. केरल की पहली सरकार को ये सुधार विरासत में मिले जिन्हें आगे बढ़ाया गया. बाद के दशकों में अलग-अलग सरकारें आयीं लेकिन शासन की लोक कल्याणकारी नीतियों में बदलाव नहीं आया. शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि सुधार आदि के क्षेत्र में जो सक्षम व्यवस्था आज देश में सबसे बेहतर परिणाम दे रही है उसने रजवाड़ों के काल से आज तक लंबी यात्रा की है. कोरोना संकट के इस समय में केरल जो परिणाम दे रहा है उसमें केवल स्वास्थ्य या फिर शिक्षा का ही योगदान नहीं है बल्कि यह पूरी प्रक्रिया हिस्सेदार है.

केरल से सीख

किसी भी मॉडल की वास्तविक सफलता उसके अनुकरण में है. आम तौर पर मानव विकास के अलग-अलग सूचकांकों में पहले से ही काफी ऊपर रहने वाला केरल कोरोना वायरस से जुड़े संकट में एक उदाहरण बनकर उभरा है. इसके बाद से कई जगहों पर इस ‘केरल मॉडल’ को अपनाने की मांग उठने लगी है. सार्वजनिक स्वास्थ्य के मोर्चे पर देश के अधिकांश राज्य जिस संकट से जूझ रहे हैं उसमें ऐसी मांग का आना लाजिमी है.

वर्तमान समय में जब हर क्षेत्र में नवीन चुनौतियां उभर रही हैं तब पुराने और अस्वस्थ तंत्रों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता. उसे बदलने के लिए प्रयास करने ही होंगे. एक स्वस्थ तंत्र से ही प्रगति तक सब की पहुंच संभव की जा सकती है. जब तक वह नहीं होगा जो केरल में देखने को मिल रहा है, वह भी नहीं होगा.

आलोक रंजन 

 

 

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