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गणेश चतुर्थी पर जानें त्योहार के उत्सव से लेकर श्राप तक कि कहानी

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गणेश उत्सव को मनाने के पीछे क्या है मान्यता और क्यों इस दिन चंद्रमा को देखना अशुभ  माना जाता है 


 

 

देशभर में गणेश चतुर्थी को बड़े धूमधाम से मनाया जाता है लेकिन महाराष्ट्र में इस दिन का नजारा ही कुछ और होता है। इस साल गणेश चतुर्थी 22 अगस्त को मनाई जा रही है। इस बार कोरोना संक्रमण के चलते लोग भले ही ढोल-ताशे के साथ सड़कों पर न निकलें लेकिन भक्तों में उत्साह और जोश हमेशा की तरह है।

 

गणेश उत्सव को मनाने के पीछे क्या है मान्यता

जानकारी के मुताबिक गणेशोत्सव मनाने की परंपरा पेशवाओं ने शुरू की थी। बुजुर्गों का मानना है कि पेशवा सवाई माधवराव के शासन के दौरान पुणे के प्रसिद्ध शनिवारवाड़ा नामक राजमहल में भव्य गणेशोत्सव मनाया जाता था। यहीं से गणेशोत्सव की शुरुआत हुई। इसके बाद 1890 में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बाल गंगाधर तिलक अक्सर सोचा करते थे कि कैसे लोगों को इकट्ठा किया जाए। ऐसे में उनके मन में विचार आया कि लोगों को एक साथ लाने के लिए क्यों न गणेशोत्सव  (विनायक उत्सव) को ही सार्वचनिक रूप से मनाया जाए। ऐसे में महाराष्ट्र में गणेशोत्सव को इतने बड़े पैमाने पर मनाने की शुरुआत बाल गंगाधर तिलक के जरिए हुई।

 

इस दिन चांद को देखना अशुभ क्यों माना जाता है 

गणेश चतुर्थी को कलंक चतुर्थी भी कहा जाता है। इस दिन चंद्र दर्शन करना निषेध बताया जाता है। माना जाता है कि इस दिन चंद्रमा देखने से आरोप लगता है। विष्णु पुराण में एक कथा है कि श्रीकृष्ण ने एकबार चतुर्थी के दिन चंद्रमा देख लिया था तो उन पर स्यमंतक मणि की चोरी का आरोप भी लगा था। आइए जानते हैं गणेश चतुर्थी के दिन चांद को देखना अशुभ क्यों मानते है।

 

कहा जाता है कि भद्रमास की शुक्ल पक्ष की तृतीय तिथि को गणेश जी ने चंद्रमा को श्राप दिया था। आखिर ऐसा क्या हुआ कि गणेश जी ने क्रोध में आकर चंद्रमा को श्राप दिया। माना जाता है कि एक दिन गणेश जी भोजन करके आ रहे थे रास्ते में चंद्रदेव मिले जो उनके उदर को देख हंसने लगे तभी गणेश जी ने क्रोधित हो उन्हें क्षय होने का श्राप दिया था। इस श्राप के बाद से हर दिन चंद्रदेव मृत्यु की ओर बढ़ने लगे थे।

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देवताओं ने चंद्रमा को शिवलिंग की पूजा करने को कहा। चंद्रदेव ने गुजरात के चंद्र तट पर शिवलिंग की पूजा की। शिव जी ने चंद्रमा की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें अपने सिर पर विराजमान कर चंद्रदेव को मृत्यु से बचा लिया था।

 

इस जगह पर शिव जी चंद्रमा की प्रार्थना पर ज्योतिर्लिंग रूप में पहली बार प्रकट हुए थे। इसलिए शिवाजी सोमनाथ भी कहलाये जाते हैं।

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