बिहार के एक छोटे से गांव में रहने वाले दिलखुश कुमार बन गए हैं “Arya go” कंपनी के फाउंडर और सी. ई. ओ. हैं । Arya go कंपनी एक ऑनलाइन कैब बुकिंग कंपनी है जो की सिर्फ बिहार में सेवा उपलब्ध करवा रही है ।
कैब की शुरूआत करने का लक्ष्य दिलखुश के लिए सिर्फ पैसा कमाना नहीं था , वे अपने इस काम से समाजिक कल्याण का काम भी करते हैं । Arya go देश की पहली ऐसी कंपनी है जो की बेटी पैदा होने पर बच्ची और उसकी मां को अस्पताल से घर तक मुफ्त में पहुंचाती है , और देश के शाहिद सैनिकों के घर वालों के लिए भी ये अच्छा कार्य करते हैं जिससे उन्हें कहीं भी आने जाने में कोई तकलीफ न उठानी पड़े ।

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प्रारंभिक जीवन

दिलखुश कुमार बिहार में सहरसा गांव के रहने वाले हैं । इनके पिताजी एक प्राइवेट बस चालक थे । शुरआती समय में बस चालकों की तनख्वाह उतनी ज्यादा नहीं होती थी और खासकर प्राइवेट बस चालक की । उन्होंने बस चालकों की दशा को सुधारने के लिए भी इस कंपनी की शुरुआत की । पिताजी की 4500 रुपए की तनख्वाह उनके परिवार का पालन पोषण करने के लिए काफी नहीं थी । इसलिए परिवार को संभालने और पिता जी की मदद करने के लिए उन्होंने एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में ठेकेदार की नौकरी करनी शुरू कर दिया ।


हर सफल इंसान रातों रात सफल नहीं बन पाता , उसे कड़ी मेहनत करनी ही पड़ती है और कई बार ऐसा भी समय आता है की लोग आपको नीचा दिखाने की कोशिश भी करते हैं कुछ ऐसा ही हाल दिलकुश कुमार के साथ भी हुआ था । बात 2011 की है जब बेरोजगारी के चलते वह काम की तलाश में सहरसा के जॉब मेले में पहुंचे थे जहां पर उनके आवेदन पत्र को पटना के किसी कंपनी में भेज दिया गया और इंटरव्यू के लिए उन्हें पटना बुलाया गया जहां उन्हें 2400 प्रति माह की सैलरी मिलने वाली थी ।इंटरव्यू का दिन आया और अपने साथ आंधी और तूफान भी लाया था । घर से रेलवे स्टेशन तक जाने का कोई साधन नहीं मिल रहा था क्योंकि गांव से रेलवे स्टेशन तक की दूरी दस किलोमीटर है फिर उन्होंने अपने एक मित्र से मदद मांगी और बारिश से बचने के लिए पूरी तरह से प्लास्टिक में खुद को लपेट लिया ।

बारिश ने उनका पीछा इस कदर पकड़ लिया था की पटना तक तो बिना भीगे पहुंच गए थे लेकिन पटना से ऑफिस तक पहुंचने में वह पूरी तरह से भीग चुके थे । किसी तरह वह ऑफिस पहुंचाने के बाद उन्होंने देखा की वहां उन्ही की तरह और भी दर पंद्रह लोग नौकरी के लिए इंटरव्यू देने आए थे । इंटरव्यू देने के लिए जब वह अंदर गए तो सामने तीन साहब और दो महिलाएं बैठी थीं ।

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तभी उनमें से एक साहब ने अपना फोन उठा कर उन्हें फोन का लोगो दिखाया और पूछा की इस कंपनी का नाम बताओ लेकिन उन्हें उस कंपनी का नाम नहीं मालूम था क्योंकि उन्होंने उसे पहली बार देखा था फिर उन साहब ने उन्हें बताया कि यह एप्पल कंपनी का लोगो है और यह फोन आईफोन है ।


10 साल पहले की यह कहानी दिलखुश के मन कुछ इस कदर से बस गई थी की आज अपनी मेहनत के पैसों से दिलखुश ने भी आईफोन खरीद लिया है । और उन्हे खुद पर बहुत गर्व भी महसूस होता है ।

“Arya go” की शुरुआत

इसी बीच 2016 में उन्होंने देखा कि गांव के ज्यादातर नौजवान काम की तलाश में गांव छोड़ शहर की तरफ भाग रहे हैं । जिसे देख उन्हे अच्छा नहीं लगा और उन्होंने गांव में ही एक खुद की कंपनी खोलने का विचार किया ताकि वह गांव के लोगों को रोजगार प्रदान कर सकते और वह गांव छोड़ शहर न जाएं ।
जहां शहरों में ऑनलाइन कैब बुकिंग सर्विस बहुत ही ट्रेंड में थी तब उन्हें यह एहसास हुआ की यह सर्विस सिर्फ शहरों में ही उपलब्ध क्यूं है । जबकि गांव में भी लोगों को एक जगह से दूसरे जगह जाने में तकलीफें उठानी पड़ती हैं । रेलवे स्टेशन से गांव तक आने के लिए भी उनके पास कोई अच्छा साधन उपलब्ध नहीं था । इसलिए उन्होंने अपने गांव में ऑनलाइन कैब बुकिंग सर्विस खोल ली और उसका नाम “Arya go” रखा ।

कठिनाइयां

कोई भी नया काम शुरू करने मे हर किसी को कठिनाईयों का सामना तो करना ही पड़ता है जिसे दिलखुश कुमार ने भी किया । नया काम शुरू करने के लिए उनके पास ठेकेदारी से कमाए पर्याप्त पैसे तो थे लेकिन उस काम में उनका सहयोग करने के लिए लोग नही थे ।


वह काम शुरू करने के लिए लोगों के पास जा कर उनकी गाड़ी मांगने लगे लेकिन लोगों ने साफ इंकार कर दिया । उन्हें लगा की दिन के सौ–दो सौ रुपए के लिए वे अपनी गाड़ी किसी को क्यों दें । दिलखुश के पास जब और कोई चारा नहीं बचा तब उन्होंने अपने ही पैसों से दो पुरानी गाड़ी खरीद काम शुरू किया और रोज़ के सौ–दो सौ रुपए के बजाय उन्हें हज़ार रुपए से ज्यादा मिलने लगे जिसे देख लोगों को भी एहसास हुआ की इस काम में बहुत मुनाफा है और उन्होंने भी अपनी गाड़ी दिलखुश के कंपनी में लगानी शुरू कर दी । और आज के समय में Arya go कंपनी में दो सौ से भी ज्यादा गाड़ियां जुड़ी हैं और लोगों को सर्विस उपलब्ध करवा रही हैं ।

दिलखुश के पास एक अच्छा बिजनेस माइंड तो था लेकिन एक अच्छी टेक्नोलॉजी की समझ उन्हें नहीं थी । और अपनी गाड़ियों को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध करवाने के लिए उन्हें एक बेहतरीन आई. टी. की समझ रखने वाले इंसान की जरूरत पड़ी तब उन्होंने अपने दोस्त अवधेश से बात की जो की उस समय एच. सी. एल. जैसी बड़ी कंपनी में काम कर रहा था । लेकिन अवधेश ने इस कम्पनी को छोड़ गांव वापस जाने से इनकार के दिया था । कई महीनों तक दिलखुश ने उन्हें समझाया और वे राज़ी हुए और गांव आ कर Arya go का पूरा आई. टी. सेक्शन संभालने लगे ।


Arya go को गाड़ियां और उसे बुक करने के लिए एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तो मिल गया था लेकिन लोगों तक इस बात की जानकारी पहुंचाने के लिए एक बढ़िया मार्केटिंग मैनेजर की जरूरत पड़ी । इसलिए दुबारा से वह अपने दूसरे बचपन से दोस्त चेतन के पीछे तीन साल तक पड़े रहे । तीन साल बाद चेतन ने उनकी बात मानी और क्विकर कंपनी को छोड़ वह Arya go की पूरी मार्केटिंग टीम संभालने लगे ।

Arya go फिलहाल बिहार के तीन जिले सहरसा , मधेपुरा , सुपौल के साथ साथ और भी सात शहरों में फैल चुकी है और ओला उबर जैसी सेवा किफायती दामों में उपलब्ध करवा रही है । लेकिन बहुत जल्द ही वह पूरे बिहार और उत्तराखंड में भी सेवा उपलब्ध करेगी ।

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