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खतरे के बावजूद राज्य सरकारें शराब की दुकानें क्यों खुलवा रही हैं?

भारत में लगातार कोरोना वायरस के मामले सामने आ रहे हैं लेकिन बीते एक हफ्ते में ये बहुत तेजी से बढ़े हैं.  मंगलवार को कोरोना वायरस के मामलों और मौतों की संख्या में एक दिन के दौरान सबसे बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई. देश में कोरोना वायरस के कुल मामले इस वक्त पचास हजार से ऊपर पहुंच गए हैं और इससे होने वाली मौतों का आंकड़ा है 1900.

इन आकड़ों के बीच सरकार के एक फैसले ने लोगों को हैरान कर दिया है. यह फैसला है पूरे देश में शराब की बिक्री को मंजूरी देने का. इस फैसले के बाद जब चार मई को शराब की दुकानें खुली तो उन पर लोगों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी. दिल्ली और मुंबई सहित वे इलाके जहां खतरा अभी भी बरकरार है, वहां भी सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए हजारों लोगों की भीड़ दुकानों के बाहर नजर आयी. इसके अगले दिन दिल्ली सहित कुछ राज्यों ने शराब पर कोरोना टैक्स भी लगा दिया, लेकिन इसके बाद भी ठेकों पर लोगों की भीड़ कम नहीं हुई है.

कोरोना वायरस का संक्रमण फैलने के खतरे के बावजूद राज्यों द्वारा शराब की बिक्री पर रोक न लगाने का कारण इससे मिलने वाले राजस्व को माना जा रहा है. शराब से मिलने वाले टैक्स को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से बाहर रखा गया है जिसका लाभ सीधे तौर पर राज्य सरकारों को मिलता है. राज्यों को शराब के निर्माण और बिक्री पर लगाए गए उत्पाद शुल्क से सबसे ज्यादा पैसा मिलता है. इसके अलावा विदेश से आने वाली शराब पर परिवहन शुल्क, लेबल शुल्क और ब्रांड पंजीकरण शुल्क भी लगाए जाते हैं. कुछ राज्य शराब पर अलग से वैट भी वसूलते हैं. उत्तर प्रदेश और कुछ अन्य राज्य बीते साल से आवारा पशुओं के रखरखाव के लिए भी शराब पर विशेष टैक्स लगाकर फंड जुटा रहे हैं.

भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) द्वारा बीते साल जारी की गयी एक रिपोर्ट के मुताबिक अधिकांश राज्यों को टैक्स से आने वाले अपने कुल राजस्व का लगभग 10-15 फीसदी हिस्सा अकेले शराब और एल्कोहल से बनने वाले अन्य उत्पादों से मिलता है. कुछ राज्य तो ऐसे भी हैं जिनके राजस्व का 30 से 50 फीसदी तक का हिस्सा शराब से मिलने वाले उत्पाद शुल्क से आता है. यही वजह है कि जब शराब को जीएसटी में शामिल किया जा रहा था तो ज्यादातर राज्य सरकारें केंद्र के इस फैसले के खिलाफ थी. उन्होंने जीएसटी का समर्थन तब किया जब केंद्र ने शराब को जीएसटी के दायरे से बाहर रखने का निर्णय लिया. आरबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान दिल्ली और पुदुचेरी सहित देश के 29 राज्यों ने शराब पर उत्पाद शुल्क के जरिए संयुक्त रूप से एक लाख 50 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई की. 2019-20 के दौरान इसमें 16 फीसदी की वृद्धि हुई और यह आंकड़ा एक लाख 75 हजार करोड़ रुपये को पार कर गया. वित्त वर्ष 2018-19 में सभी राज्यों ने संयुक्त रूप से हर महीने औसतन करीब 13 हजार करोड़ रुपए शराब से कमाए. जबकि 2019-20 में कमाई का यह आंकड़ा 15,000 करोड़ रुपए प्रति माह था.

अधिकारियों की मानें तो वर्तमान वित्त वर्ष में राज्य सरकारों को शराब से इससे भी अधिक राजस्व मिलने की उम्मीद थी.

अलग-अलग राज्यों के हिसाब से देखें तो शराब की कमाई के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे ऊपर नजर आता है. वित्त वर्ष 2018-19 में उत्तर प्रदेश ने उत्पाद शुल्क के जरिये शराब से 25,100 करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त किया. इसी तरह शराब पर उत्पाद शुल्क के जरिये कर्नाटक को 19,750 करोड़, महाराष्ट्र को 15,343 करोड़, पश्चिम बंगाल को 10,554 और तेलंगाना को 10,313 करोड़ का राजस्व प्राप्त हुआ.

आर्थिक मामलों के जानकार बताते हैं कि लॉकडाउन के दौरान राज्य सरकारों का बहुत पैसा खर्च हुआ है, कई राज्यों के खजाने खाली होने की नौबत आ गयी है. ऐसी हालत में उन्हें कोरोना वायरस से निपटने के लिए और पैसों की जरूरत है, जबकि लॉकडाउन के चलते बाजार, परिवहन, काम-धंधे सब बंद हैं. राज्यों के टैक्स कलेक्शन में 90 फीसदी तक की गिरावट आयी है, जीएसटी मिल नहीं रहा है. पेट्रोल और डीजल जिनसे राज्यों को सीधा फायदा मिलता है, उसकी भी बिक्री गिर गयी है. जानकारो की मानें तो ऐसे समय में राज्य सरकारों के पास शराब के जरिये ही पैसे कमाने का एक मात्र विकल्प बचा है.

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