HealthIndia Rise Special

कोरोना वायरस: मरीजों में अलग-अलग लक्षण मिलने से वैज्ञानिक हैरान, कारण तलाशने में जुटे

द इंडिया राइज
कोरोना के कुछ मरीजों को सिर्फ साधारण सर्दी-जुकाम की शिकायत होती है तो कुछ में संक्रमण के लक्षण ही नहीं उभरते। वहीं, बड़ी संख्या में संक्रमित इस कदर बीमार पड़ जाते हैं कि उन्हें वेंटिलेटर पर रखने तक की नौबत आ जाती है। इनमें से कई उपचार के दौरान दम भी तोड़ देते हैं। अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक अब अलग-अलग मरीजों में कोरोना संक्रमण की गंभीरता के स्तर में अंतर के पीछे की वजहें तलाशने में जुट गए हैं।
Corona-test
जेनेटिक संरचना भी हो सकती है जिम्मेदार
आइसलैंड में कोरोना संक्रमण पर शोध कर रही जानी-मानी जेनेटिक रिसर्च फर्म ‘डिकोड जेनेटिक्स’ के विशेषज्ञों के मुताबिक यह बात जगजाहिर है कि उम्र के अलावा मोटापा, डायबिटीज, हृदयरोग, हाइपरटेंशन, श्वासरोग व कैंसर जैसी बीमारियां तय करती हैं कि कोई संक्रमित कोरोना से किस हद तक लड़ पाएगा, लेकिन लक्षणों में अंतर के लिए सिर्फ इन्हीं कारकों को जिम्मेदार ठहराना ठीक नहीं। जीन भी बहुत हद तक यह निर्धारित करते हैं कि कोरोना वायरस किस मरीज पर कितना गंभीर हमला करेगा।

इसलिए ज्यादा संवेदनशील होते कुछ लोग
‘डिकोड जेनेटिक्स’ के प्रमुख कैरी स्टीफेंसन कहते हैं, ‘कोरोना से संक्रमित कई मरीज गंभीर स्थिति में पहुंच जाते हैं, जबकि कुछ मामूली लक्षण के बाद ठीक हो जाते हैं। इसके पीछे दो कारण हो सकते हैं। पहला, वायरस की खुद की जेनेटिक संरचना। विभिन्न शोध से स्पष्ट हुआ है कि कोरोना की कुछ नस्लें ज्यादा घातक होती हैं। दूसरा, हर संक्रमित की अलग अनुवांशिकी। कुछ लोगों के जीन उन्हें संक्रमण के प्रति ज्यादा संवेदनशील बनाते हैं तो कुछ के जीन इसके खिलाफ बेहतर प्रतिरोधक क्षमता विकसित करते हैं।’

इलाज खोजने के काम में आएगी तेजी
कैरी की मानें तो कोई व्यक्ति किसी भी वायरल संक्रमण के खिलाफ क्या प्रतिक्रिया देता है, यह बहुत हद तक जीन से तय होता है। इसलिए कोरोना के लिए जिम्मेदार सार्स-कोव-2 वायरस के साथ ही संक्रमण के प्रति कम अथवा ज्यादा संवेदनशील मरीजों की जेनेटिक संरचना का अध्ययन भी बेहद जरूरी है। इससे न सिर्फ उन लोगों की पहचान मुमकिन हो पाएगी, जिनके लिए कोरोना ज्यादा घातक साबित हो सकता है, बल्कि संक्रमण के खात्मे में कारगर दवाएं और टीका विकसित करने के काम में तेजी भी आएगी।
CORONA1
वायरल संक्रमण में जीन की भूमिका
-सीसीआर-5 जीन की संरचना में एक बदलाव से एचआईवी के खिलाफ व्यक्ति की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है
-2017 में हुए एक शोध में चेचक, दाद व विभिन्न चर्मरोगों का व्यक्ति की जेनेटिक संरचना से सीधा संबंध मिला था

कोरोना के जीन से संबंध के संकेत
-शुरुआती शोध में संकेत मिले हैं कि कोरोना वायरस एसीई-2 कोशिकाओं में प्रवेश के लिए जिस रिसेप्टर का इस्तेमाल करता है, वह जीन और दवाओं के उपभोग के आधार पर अलग-अलग व्यक्ति में अलग-अलग संख्या में मौजूद हो सकता है
-‘द होस्ट जेनेटिक्स इनिशिएटिव’ के तहत दुनिया के दर्जनों शीर्ष संस्थानों के वैज्ञानिक सार्स-कोव-2 से संक्रमित मरीजों की जेनेटिक संरचना का विश्लेषण करने के लिए सौ से अधिक शोध कर रहे, ताकि वायरस के खात्मे में सक्षम एंटीबॉडी तैयार हो पाए
-मोटापे, डायबिटीज और उच्च रक्तचाप के शिकार लोगों के कोरोना संक्रमण के बाद अस्पताल में भर्ती होने की दर अधिक पाई गई है, विभिन्न अध्ययनों में वजन से संबंधित इन स्वास्थ्य विकारों के पीछे पीड़ित की जेनेटिक संरचना का भी हाथ मिला है

प्रतिरोधक तंत्र की प्रतिक्रिया भी परख रहे शोधकर्ता
येल यूनिवर्सिटी सहित कुछ संस्थान कोरोना वायरस के खिलाफ प्रतिरोधक तंत्र की प्रतिक्रिया भी समझ रहे। उनका मानना है कि नए तरह के विषाणु को नष्ट करने की जद्दोजहद में प्रतिरोधक तंत्र कई बार अतिसक्रिय हो जाता है। वैज्ञानिक भाषा में इस अवस्था को ‘साइटोकिन स्टॉर्म’ कहते हैं। इससे शरीर को हमलावर वायरस से कहीं ज्यादा नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है। अंग खराब होने से मरीज की जान तक जा सकती है। शोधकर्ता अकीको इवासाकी कहते हैं, अगर हम यह जान लें कि कुछ लोगों में ‘साइटोकिन स्टॉर्म’ की स्थिति क्यों पनपती है तो उन्हें बेहतर उपचार देना संभव होगा। वैसे, कई अध्ययन इसमें भी जीन की भूमिका की ओर इशारा करते हैं।

Follow Us
Show More

Related Articles

Back to top button
%d bloggers like this: