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कभी महात्मा गांधी को भी किया गया था क्वारंटीन

घर के बुजुर्गों से सुना और रिपोर्टों में पढ़ा है, कि सालों पहले प्लेग और हैजा जैसी महामारियां गांव के गांव ख़त्म कर देती थीं.  ये किस्सा उसी दौर का है जब गांधी को क्वारंटीन होना पड़ा था.

1896 की बात है. गांधी साउथ अफ्रीका से भारत लौटे.  वापसी का सफ़र शुरू हुआ दिसंबर, 1896 में. जहाज़ पर गांधी के साथ थीं कस्तूरबा, बेटे हरिलाल और मणिलाल. गांधी की  बहन का बेटा गोकुलदास भी साथ था. जनवरी, 1897 में ये जहाज़ डरबन के किनारे लगा. लेकिन जहाज से लोगों को उतरने नहीं दिया गया.

असल में जब गांधी अफ्रीका के लिए निकले थे, तब राजकोट समेत दुनिया के कई हिस्सों में प्लेग फैला था. तब महामारी फैलना आम बात थी. ऐसे में व्यवस्था थी कि महामारी वाले इलाकों से आ रहे जहाज़ या स्टीमर बंदरगाह पर लंगर डालने से पहले पीला झंडा दिखाएंगे. ये झंडा दिखाने के बाद जहाज के लोगों की मेडिकल जांच होती. सब ठीक रहने के बाद ही वो पीला झंडा उतारा जाता.

वहां के मेडिकल विशेषज्ञ मानते थे कि प्लेग के जीवाणु 23 दिनों तक ज़िंदा रह सकते जब जहाज को हैं. इसीलिए जहाज को भारत से चले 24 दिन पूरे होने तक अलग-थलग रखा जाता था. जिस जहाज में गांधी थे, उसके साथ भी ऐसा ही हुआ. 13 जनवरी, 1897 को जहाज से लोग निकाले गए.

एमकेगांधी ओआरजी पर छपे एक डॉक्यूमेंट में इस वक़्त का क़िस्सा मिलता है. इसके मुताबिक, गांधी जब जहाज से उतरे तो ‘गोरों’ ने उनके साथ बुरा व्यवहार किया. उन पर अंडे और पत्थर फेंके. भीड़ ने उन्हें पीटा भी. वहां के एक पुलिस सुपरिटेंडेंट की पत्नी ने बीच-बचाव करके गांधी की जान बचाई. मामला बढ़ा, तो लंदन से निर्देश आया. इसमें नताल सरकार से कहा गया कि वो गांधी पर हमला करने वालों पर कार्रवाई करे. कार्रवाई हुई भी. कुछ लोगों को पकड़ा भी गया. मगर गांधी ने आरोपियों की शिनाख़्त करने से इनकार कर दिया.

क्या क्वारंटीन के लिए हिंदी में कोई शब्द नहीं है? क्या गांधी के प्रसंग में भी इसी शब्द का इस्तेमाल हुआ था?

अभी तो हिंदी में भी लोग ‘क्वारंटीन’ ही लिख रहे हैं. लेकिन गांधी ने इसके लिए ‘सूतक’ शब्द का इस्तेमाल किया था. ये ‘सूतक’ भारतीय परंपरा का एक हिस्सा है. पहले क्या होता था कि बच्चे को जन्म देने के बाद मां करीब पांच हफ़्ते अलग रहती थी. उनके कमरे में बहुत कम लोग जाते थे. जो जाते थे, वो बहुत एहतियात बरतते थे. ऐसे ही जब किसी की मौत होती, तो सनातन परंपरा में मुखाग्नि देने वाले को 10 दिनों तक अलग-थलग रहना पड़ता था.

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