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औद्योगिक पहचान को जूझता गेटवे ऑफ उत्तराखंड

औद्योगिक पहचान को जूझता गेटवे ऑफ  उत्तराखंड

रबड़ फैक्ट्री, विमको, किसान जैसी बड़ी फैक्ट्रियां हुईं बंद
1990 से 2000 के बीच में बंद हुए लगभग 300 उद्योग

बरेली। उत्तराखंड के गेटवे के रूप में मशहूर बरेली औद्योगिक नगरी के रूप में अपनी पहचान नहीं बना पाई। दिल्ली-लखनऊ के बीचों-बीच स्थित होने के बाद भी 1990 से लेकर 2000 तक बरेली में लगभग 300 फैक्ट्रियां बंद हुईं। वर्षों बाद भी बरेली रबड़ फैक्ट्री जैसी एक बड़ी पहचान के लिए जूझ रहा है।

उद्योगों की बात की जाए तो बरेली की पहचान जरी-जरदोजी, बांस और सुरमे तक ही सीमित होकर रह गई। 1960 में बरेली में रबड़ फैक्ट्री लगी थी। लंबे समय तक यह फैक्ट्री बरेली की शान रही। 15 जुलाई 1999 को रबड़ फैक्ट्री बंद हुई। यह वह दौर था जब एक-एक कर बरेली के उद्योगों में ताले पड़ते चले गए। विमको, आईटीआर, नेकपुर चीनी मिल, भोजीपुरा की किसान जैम फैक्ट्र्री, बहेड़ी की कताई मिल, आंवला की दूध फैक्ट्री समेत 300 छोटी-बड़ी फैक्ट्री बंद हुईं। इस दौरान जो उद्योग लगे वो निजी क्षेत्रों में लगे। आज भी बरेली के लोगों में इस बात की कसक है। उद्योगों के बंद होने से बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हो गए। इन में से तमाम को शहर छोड़कर पलायन करना पड़ा।

वर्तमान में औद्योगिक परिदृश्य
परसाखेड़ा औद्योगिक क्षेत्र- 152 फैक्ट्री
सीबीगंज औद्योगिक क्षेत्र- 38 फैक्ट्री
भोजीपुरा औद्योगिक क्षेत्र- 35 फैक्ट्री
रजऊ औद्योगिक क्षेत्र- 20 फैक्ट्री

उत्तराखंड चले गए निवेशक
उत्तराखंड के गेटवे को उत्तराखंड से ही बड़ा नुकसान हुआ। उत्तराखंड में अधिक सुविधाएं मिलने के कारण उद्यमी वहां चले गए। बाहरी निवेशकों ने भी बरेली की जगह उत्तराखंड में ही निवेश करना पसंद किया। जो कुछ नए प्रोजेक्ट आए, उन्हें समय से संसाधन नहीं मिले। इस कारण वो प्रोजेक्ट भी परवान नहीं चढ़ पाए।

सरकारी नीतियां रहीं जिम्मेदारी
तमामा सरकारी नीतियों के कारण भी उद्योग बंद हुए। उत्तराखंड बनने के चलते भी नुकसान हुआ। उत्तराखंड में दस वर्षीय एसईजेड का फायदा था। अगर बरेली में भी एसईजेड बनता तो बरेली को भी लाभ मिलता। यह अफसोस की  बात है कि जब एक बार उद्योग बंद होने शुरू हुए तो उन्हें बचाने के लिए समुचित प्रयास नहीं किए गए।


बरेली में भी बने एक सिडकुल

इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन और चैंबर ऑफ कामर्स की मांग है कि बरेली में भी एक सिडकुल का निर्माण किया जाए। सिडकुल के आने से बरेली के उद्योगों को रफ्तार मिलेगी। सिडकुल के लिए 15 योजनागत सुझाव भी दिए गए-

40 फिट चौड़ी हों सड़कें
सिडकुल की सभी सड़कें 40 फीट चौड़ी होनी चाहिए।  सड़क की क्षमता 40 टन की हो। साथ ही सड़क के दोनों ओर ट्रक खड़े करने के लिए पक्की पटरी की व्यवस्था होनी चाहिए। इससे मुख्य मार्ग पर जाम नहीं लगेगा।

लाइट की विशेष व्यवस्था
सिडकुल में सड़कों पर बिजली की विशेष व्यवस्था होनी चाहिए। योजनाबद्ध तरीके से सड़कों और विशेषकर चौराहों पर रोड लाइट की व्यवस्था की जाए।

ड्रेनेज की हो दोहरी व्यवस्था
बरेली में अभी तक बने औद्योगिक क्षेत्रों में ड्रेनेज की व्यवस्था काफी खराब है। इसलिए सिडकुल में पानी निकासी के लिए दोहरी व्यवस्था होनी चाहिए। इसमें एक ड्रेनेज लाइन से सादा पानी और दूसरी लाइन से प्रदूषित पानी निकलना चाहिए

उद्योग अपशिष्ट शोधक प्लांट लगे
उद्यमियों ने उद्योग अपशिष्ट शोधक प्लांट की स्थापना किये जाने की मांग की। ताकि उद्योगों का प्रदूषित पानी प्रदूषण मुक्त होकर ही किसी नाले या नदी में गिरे। इससे उद्योग पर्यावरण मित्र के रुप में भी संचालित हो सकेंगे।

24 घण्टे बिजली की आपूर्ति
सिडकुल में अलग से विद्युत सब स्टेशन बनाया जाए। ताकि उद्योगों को 24 घंटे बाद विद्युत आपूर्ति मिल सके।

अपना हो फायर स्टेशन
सिडकुल की स्थापना के साथ ही फायर स्टेशन के लिए भी जमीन का आवंटन कर दिया जाए। उद्योगों के लगने के पहले ही फायर स्टेशन खुल जाना चाहिए।

कौशल विकास केंद्र की स्थापना
सिडकुल में कौशल विकास केंद्र की स्थापना के लिए भी पहले से ही जमीन दी जाए। सिडकुल की स्थापना के साथ ही कौशल विकास केंद्र शुरू कर दिया जाए, ताकि उद्योगों के लिए प्रशिक्षित कामगार मिल सके।

चार कैंटीन का हो निर्माण
रिहाइशी इलाकों से दूर होने के कारण औद्योगिक क्षेत्र में खाने पीने की काफी दिक्कत होती है। इस लिए सिडकुल में कम से कम चार कैंटीन खोली जाएं। ताकि श्रमिकों, ड्राइवरों और दैनिक मजदूरों को खान पान की परेशानी ना हो।

सार्वजनिक शौचालयों का हो निर्माण
उद्यमियों ने कहा कि स्वच्छ भारत अभियान जोरों पर है। ऐसे में सिडकुल क्षेत्र में कम से कम 4 सार्वजनिक शौचालय बनाए जाएं। ताकि आने जाने वाले श्रमिकों, कामगारों, आगंतुकों आदि को शौचालय के लिए परेशान ना होना पड़े।

सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम
सिडकुल योजना के अंतर्गत पुलिस और प्राइवेट सुरक्षा कर्मियों के लिए स्थान और भवन सुनिश्चित किया जाए।

हरियाली का रखा जाए ध्यान
औद्योगिक क्षेत्र में लाख प्रयास के बाद भी प्रदूषण होता है। इसलिए सिडकुल में पौधरोपण के लिए पहले से ही जगह छोड़ी जाए। सड़क के दोनों और भी पौधरोपण कर उन के रखरखाव के लिए बजट का आवंटन हो।

आईआईए भवन को मिले जमीन
इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के कार्यालय के लिए पहले से ही एक प्लाट आवंटित किया जाए।

श्रमिकों के लिए हो बस की सुविधा
सिडकुल को बसाते  समय यह सुनिश्चित किया जाए कि वहां कार्यरत श्रमिकों के आने जाने के लिए बस का इंतजाम हो।

वास्तु के हिसाब से हों प्लाट
सिडकुल की स्थापना के समय ही वास्तु शास्त्र के हिसाब से प्लॉट काटे जाएं। ताकि कोई उद्यमी वास्तु का बहाना बनाकर उद्योग लगाने से न बच सके।

श्रमिक कॉलोनी बनाई जाए
सिडकुल में श्रमिक कॉलोनी भी बनाई जाए। ताकि फैक्ट्री में काम करने वाले श्रमिक किराए पर रह सकें।

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