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ऑनलाइन कक्षाएं, भविष्य की आहट…..

पूरी दुनिया आज जिस महामारी से जूझ रही है, उस कोरोना के अति सूक्ष्म विषाणु से चारों तरफ त्राहि-त्राहि मची हुई है। प्रकृति को छोड़कर सब कुछ स्थगित है। मानव रचित इस दुनिया में यातायात, कार्यालय, व्यापार, विद्यालय सब कुछ ऐसे थम गया मानो कभी चला ही ना हो। महामारी से बचने के लिए सरकार ने लॉक डाउन को किया। आवश्यक वस्तुएं केवल मिल पा रही हैं। लॉक डाउन की लंबी खींच दी  गई अवधि के बीच शिक्षा, शिक्षण, शिक्षक और शिक्षार्थी सब नए प्रयोगों के दौर से गुजर रहे हैं। जैसे जैसे लॉकडाउन आगे बढ़ा,अभिभावकों को चिंता सताने लगी कि केवल मोबाइल गेम खेलकर और टीवी देख देख कर कहीं बच्चे इन्हीं  चीजों के आदी ना हो जाएं। विद्यालयों को चिंता हुई कि शैक्षिक सत्र प्रारंभ नहीं हुआ तो कैसे चलेगा।

सरकार द्वारा निर्णय लिया गया कि ऑनलाइन कक्षाएं चलाई जाए। विभिन्न प्रकार के ऐप हैं। किसी का भी उपयोग हो, लेकिन बच्चों को पढ़ाने का क्रम तो प्रारंभ हो। शुरू हुई ऑनलाइन कक्षाएं। चाहे गूगल के एप्लीकेशन हों या जूम मीटिंग ऐप। बात चाहे ई लर्निंग की हो या यूट्यूब, व्हाट्सएप पर शैक्षिक वीडियो अपलोड करने की, मार्केट तो साहब यहां भी सज गया। स्कूलों में होड़ मच गई। “मेरी कमीज तेरी कमीज से चमकदार है” की तर्ज पर विभिन्न स्कूलों में प्रतियोगिता छिड़ गई कि कौन किस से बेहतर ऑनलाइन क्लासेज पढ़ाता है। हालांकि मकसद एक ही है बच्चों को उनकी पढ़ाई की तरफ जोड़े रखना, मोड़े रखना।

 बच्चे और उनके अभिभावक इस ऑनलाइन कक्षा की प्रक्रिया से खुश ही हैं।

बच्चे इसलिए खुश हैं कि लंबी अवधि के बाद ऑनलाइन ही सही अपने मित्रों सहेलियों से बात कर पा रहे हैं। उन्हें देख पा रहे हैं अभिभावक इसलिए प्रसन्न है कि बच्चे अब थोड़ा अनुशासित हो गए। ऑनलाइन कक्षाओं के लिए सुबह उठ कर नहा धोकर स्कूल के जैसे तैयार हो जा रहे हैं। मन से ऑनलाइन कक्षाएं अटेंड कर रहे हैं। भेजे जाने वाले असाइनमेंट को पूरा करने का प्रयास कर रहे हैं। मोबाइल गेम खेलने और टीवी देखने की प्रक्रिया भी लगभग कम हो रही है।

शिक्षक भी प्रसन्न है कि चाहे ऑनलाइन ही सही लेकिन कक्षाएं लेने का मौका मिल रहा है। पाठ्यक्रम कुछ तो चल पड़ा।

हालांकि परंपरागत कक्षाओं और आभासी कक्षाओं के वातावरण में जमीन आसमान का अंतर है। आभासी कक्षाएं कभी भी वर्तमान शिक्षा प्रणाली का विकल्प नहीं हो सकती हैं। लेकिन भविष्य की आहट जरूर हैं। वैसे भविष्य के लिए हमें इसी प्रकार के व्यवहार को बनाए रखने की आवश्यकता है।

 

विभिन्न शिक्षक शिक्षिकाओं और विद्यार्थियों के विचार में इस प्रकार की तैयारी लगातार बनी रहनी चाहिए। शालिनी भाटिया, मनीष भसीन, रजनीश त्रिवेदी जैसे अनेक शिक्षकों का विचार है कि भले ही विद्यालय खुल जाएं और जिंदगी फिर अपनी लय में लौट आए, लेकिन परंपरागत शिक्षण के बीच कम से कम 25-30% पाठ्यक्रम ऑनलाइन पढ़ाए जाने की व्यवस्था बनाए रखनी चाहिए।

बच्चे भी ऑनलाइन पढ़ाई से बहुत संतुष्ट दिखाई दे रहे हैं। सौदामिनी,  रचित, मान्या सक्सेना, तिशिर यादव, दीक्षा, दीपिका, प्रथम बाजपेई, सलोनी, अंशिका बाजपेई, गौरी जैसे विद्यार्थी हैं, जो ऑनलाइन पढ़कर आनंद ले रहे हैं। संबंधित विषयों के वीडियो, असाइनमेंट, छोटे-छोटे टेस्ट.. सब उन्हें लुभा रहे हैं।

यह वर्तमान की ऑनलाइन कक्षाएं कहीं भविष्य के प्रति कोई बहुत बड़ा संकेत तो नहीं है।

 

This piece is written by  Dr. Vaishali Agarwal, Special correspondent,  Theindiarise.com

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