World Women’s Day 2020: कुछ ऐसी कहानियां जिन्‍हें इंसान खुद लिखता है, अपनी मेहनत और हौसले से। जैसे कि इन बेटियों ने लिखा। अपनी मंजिल तय की और मजबूत इरादों से उस तरफ बढ़ चलीं, किसी की परवाह किए बगैर। कभी साधन और संसाधनों का रोना भी नहीं रोया। आज ये बेटियां देश की करोड़ों दूसरी बेटियों के लिए मिसाल बन गई हैं।
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बचपन बचाने के आंदोलन में कूद पड़ी रजिया
मेरठ के गांव नंगला कुंभा में जन्मीं रजिया बचपन में फुटबॉल सिलने का काम करती थीं। उसके बाद वह पढ़ाई करतीं। तभी उनके मन में विचार आया कि जो बच्चे दिन भर बाल मजदूरी करते हैं, वे तो कभी पढ़ ही नहीं पाते हैं। वह ‘बचपन बचाओ’ आंदोलन के साथ जुड़ गईं। इस आंदोलन के कैंपेन के तहत उन्हें गांव का बाल प्रधान चुना गया। जब वह छठी कक्षा में थीं, तो उन्होंने बाल मजदूरी में लगे बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रेरित करना शुरू किया।  छोटी-सी उम्र में बड़े कार्यों को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने उनको ‘मलाला अवार्ड’ से सम्मानित किया। 21 साल की रजिया, मदर टेरेसा को आदर्श मानती हैं। अपने सपने के बारे में दो टूक कहती हैं, “मैं बाल मजदूरी खत्म करना चाहती हूं, न केवल मेरे गांव में, बल्कि पूरे देश से।”

कंप्‍यूटर इंजीनियर से लेखक बन गई रूपा
कर्नाटक के बंगलूरू में जन्मीं रूपा किशोरावस्था में बच्चों की अंग्रेजी पत्रिका ‘टारगेट’ पढ़ती थीं। तभी उनके मन में सवाल कौंधा था कि क्या सिर्फ अमेरिकी बच्चे ही आनंद से भरपूर जीवन जीते हैं। तब उन्होंने भारतीय बच्चों के लिए कहानियां लिखना शुरू किया। तभी उनको बच्चों के लिए विज्ञान और कल्पना पर आधारित कहानियों की किताब ‘तारानॉट्स’ लिखने का प्रस्ताव मिला। यह आठ पुस्तकों की शृंखला है, जिसे पुरस्कार तक मिल चुका है। प्रकाशक वत्सला कौल बनर्जी ने जब उन्हें बच्चों के लिए गीता लिखने को कहा, तो रूपा उन्हें टालती रहीं। वजह यह थी कि उन्होंने खुद ही कभी गीता नहीं पढ़ी थी, तो बच्चों के लिए उसे आसान कैसे बनातीं। तब उन्होंने गीता खरीदी और उसके हर अध्याय को समझा। 48 वर्ष रूपा पाई ने हाल ही में बच्चों के लिए बेहद सरल और रोचक तरीके से ‘द वेदास एंड उपनिषद फॉर चिल्ड्रंस’ लिखी है।

जानवरों से था प्‍यार तो बन गईं वाइल्‍ड लाइफ फोटोग्राफर
राधिका रामासामी को फोटोग्राफी और यात्राओं का शौक तो बचपन से था, लेकिन कैमरे से प्यार 11वीं कक्षा में पढ़ने के दौरान तब हुआ, जब अंकल ने उन्हें एसएलआर कैमरा भेंट किया। कैमरा पाते ही राधिका का शौक जुनून में बदल गया। तमिलनाडु के थेनी शहर में जन्मीं राधिका 2004 में जब परिवार के साथ घूमने भरतपुर नेशनल पार्क गईं, तो उन्हें प्रकृति से प्यार हो गया। दिल्ली लौटीं तो रोजाना लगभग दो घंटे दिल्ली के ओखला बर्ड सैंक्चुएरी में बिताने लगीं। उन्हें वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफी करते 25 साल गुजर चुके हैं। वैसे वह सभी नेशनल पार्कों के अलावा केन्या और तंजानिया की यात्राएं कर चुकी हैं। राधिका बताती हैं, “हमें आई-लेवल फोटोग्राफी करनी होती है। गरमी के मौसम में जानवर सुबह पानी की तलाश में निकलते हैं। तब हम वन कर्मचारियों के साथ जंगल में वाटर बॉडीज पर जाते हैं।” राधिका रामासामी को देश की पहली प्रोफेशनल वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर होने का गौरव हासिल है।

खाना बनाने के शौक ने बना दिया व्‍यंजनों का सरताज
निलजा वांग्मो उस संघर्षशील महिला का नाम है, जिसने दुर्गम पहाड़ी गांव में जन्म लेने के बाद भी अपनी अलग पहचान बनाई। उनका जन्म अलची गांव में हुआ, जो लद्दाख की राजधानी लेह से लगभग 70 किलोमीटर नीचे सिंधु नदी के तट पर स्थित है। ऐसे दुर्गम स्थान से ज्यादा दुश्कर हालात निलजा के जीवन में तब आ गए, जब उन्होंने अपने पिता को खो दिया। तंगहाली की वजह से कॉलेज की पढ़ाई बीच में ही छूट गई। निलजा को बचपन से विभिन्न प्रकार के व्यंजन पकाने का शौक था। उन्होंने शौक को ही कॅरियर बनाने की ठान ली, और ‘अलची किचन’ नाम से लद्दाखी रेस्टोरेंट की शुरुआत की। फिर ‘अलची किचन’ के खास मैन्यू पर कसरत की और ऐसे लद्दाखी व्यंजनों को खोजा, जो लुप्त हो चुके थे। आज इस किचन की फर्मेंटेड ब्रेड खंबीर और ताशी ताग्ये चाय सबसे ज्यादा पसंद की जाती है।

भूकंप-सुनामी के अध्‍ययन को बना लिया जिंदगी का मकसद
भूकंप हो या सुनामी, दोनों तबाही के मंजर दिखाते हैं। इनका नाम ही हमें खौफ से भर देता है। लेकिन भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलूरू में प्रोफेसर कुसल राजेंद्रन ने भूकंप और सुनामी को ही अपनी जिंदगी का मकसद बना लिया। दक्षिण भारतीय परिवार में जन्मीं कुसल पढ़ाई के लिए पहले तिरुवनंतपुरम से केरल और फिर आई.आई.टी. रुड़की गईं। भू-भौतिकी (जियोफिजिक्स) में मास्टर्स के दौरान वह छह छात्रों में एकमात्र छात्रा थीं। भारतीय विज्ञान संस्थान में उन्होंने बतौर एसोसिएट प्रोफेसर प्रवेश किया। वहां उनकी मुलाकात प्रसिद्ध भू-विज्ञानी सी.पी. राजेंद्रन से हुई। बाद में दोनों ने विवाह कर लिया। दक्षिण भारत के कावेरीपट्टनम शहर में सुनामी आई, तो कुसल और उनके पति ने रिसर्च शुरू की। 2004 में मिट्टी के अवशेष से उन्होंने साबित किया कि एक हजार साल पहले भी उस स्थान पर ऐसी ही सुनामी आई थी। कुसल को ‘नेशनल अवार्ड फॉर वुमन साइंटिस्ट’ से भी सम्मानित किया जा चुका है।

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