World Women’s Day 2020: महिला दिवस पर प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने अपना ट्विटर एकउंट सात महिलाओं को सौंप दिया। ये वो महिलाएं हैं जिन्‍होंने मुश्किलों से लड़कर अपना मुकाम बनाया है। आइए जानते हैं उन महिलाओं के संघर्ष और सफलता की कहानी-
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हर भूखे पेट तक भोजना पहुंचाना है स्‍नेहा का सपना
प्रधानमंत्री ने जिन सात महिलाओं को अपना ट्विटर एकाउंट सौंपा है, उनमें पहली स्नेहा मोहनदास हैं। वह फूडबैंक नाम से अभियान चलाती हैं जो बेघरों को खाना देने का काम करता है। उन्होंने अपनी कहानी साझा करते हुए लिखा है, आपने सोचने के लिए खाना जरूरी है के बारे में सुना होगा। अब समय है कि इस पर काम किया जाए और गरीबों को एक बेहतर भविष्य दिया जाए। मुझे अपनी मां से प्रेरणा मिली जिन्होंने बेघरों को खाना खिलाने की आदत डाली। मैंने फूडबैंक इंडिया नाम के अभियान की शुरुआत की। भूख मिटाने की दिशा में मैंने स्वयंसेवियों के साथ काम किया जिनमें से ज्यादातर विदेश में रहते हैं। हमने 20 से ज्यादा सभाएं की और अपने काम के जरिए कई लोगों को प्रभावित किया। हमने साथ में मिलकर खाना बनाने, कुकिंग मैराथन, स्तनपान जागरुकता जैसी गतिविधियों की शुरुआत की। मुझे तब सशक्त महसूस होता है जब मैं वह करती हूं जिसका मुझे शौक है। मैं अपने देश के नागरिकों खासकर महिलाओं को आगे आने और मेरे साथ हाथ मिलाने के लिए प्रेरित करना चाहती हूं। मैं सभी से आग्रह करती हूं कि कम से कम एक जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराएं और एक भूख मुक्त ग्रह में योगदान दें।
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अपने हाथ खोकर भी दूसरों का सहारा बनीं मालविका
मालविका अय्यर ने लिखा स्वीकृति सबसे बड़ा इनाम है जो हम खुद को दे सकते हैं। हम जिंदगी को नियंत्रित नहीं कर सकते लेकिन हम निश्चित रूप से जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण को नियंत्रित कर सकते हैं। हर दिन के आखिर में मायने यह रखता है कि हमने अपनी चुनौतियां का किस तरह से सामना किया।

13 साल की उम्र में एक बम धमाके में मैंने दोनों हाथ गंवा दिए और पैर भी बुरी तरह से जख्मी हो गए थे। इसके बावजूद मैंने काम किया और अपनी पीएचडी की पढ़ाई की। किसी चीज को छोड़ देना विकल्प नहीं होता है। अपनी सीमाओं को भूल जाइए और विश्वास और आशा के साथ दुनिया में कदम रखते रहिए। मेरा मानना है कि शिक्षा परिवर्तन के लिए अपरिहार्य है। हमें भेदभावपूर्ण रवैये को लेकर युवाओं के दिमाग को संवेदनशील बनाना होगा। हमें विकलांग लोगों को कमजोर या दूसरे पर निर्भर दिखाने की बजाए उन्हें रोल मॉडल के तौर पर दिखाना चाहिए। मनोवृत्ति विकलांगता को नष्ट करने की आधी लड़ाई है। प्रधानमंत्री ने महिला दिवस पर मुझे मेरे विचारों को प्रसारित करने के लिए चुना है। इससे मुझे विश्वास हो गया है कि विकलांगता के मामले में भारत पुराने अंधविश्वासों को खत्म करने के लिए सही रास्ते पर चल रहा है।

कश्‍मीर की आरिफा की कहानी जानिए
मालविका के बाद प्रधानमंत्री का ट्विटर अकाउंट संभालने वाली तीसरी महिला का नाम आरिफा जान है। वह जम्मू कश्मीर की रहने वाली हैं। अपनी कहानी बताते हुए उन्होंने कहा कि मैंने हमेशा कश्मीर के पारंपरिक शिल्प को पुनर्जीवित करने का सपना देखा, क्योंकि यह स्थानीय महिलाओं को सशक्त बनाने का एक साधन है। मैंने महिला कारीगरों की स्थिति देखी और इसलिए मैंने नमदा शिल्प को पुनर्जीवित करने का काम शुरू किया। मैं कश्मीर से आरिफा हूं और यह मेरी कहानी है।

जब परंपरा और आधुनिकता का मिलन होता है तब चमत्कार होते हैं। मैंने अपने काम में इसका अनुभव किया है। इसे आधुनिक बाजार की मांग के अनुरूप बनाया । मेरी पहली व्यावसायिक गतिविधि नई दिल्ली में हस्तनिर्मित वस्तुओं की प्रदर्शनी में भाग लेना था। इस प्रदर्शनी से अच्छे ग्राहक और एक टर्नओवर मिला। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा किए गए इस कार्य से मेरा मनोबल बढ़ा है। यह मुझे अपने शिल्प की बेहतरी के साथ पूरे कश्मीर के कारीगरों के लिए कड़ी मेहनत करने में मदद करेगा। मुझे लगता है कि जरूरी यह है कि अधिक संख्या में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया जाए और अन्य महिलाओं की मदद की जाए।

कल्‍पना की कहानी किसी प्रेरणा से कम नहीं
आरिफा जान के बाद प्रधानमंत्री का ट्विटर अकाउंट संभालने वाली चौथी महिला का नाम कल्पना रमेश है। अपना परिचय देते हुए उन्होंने कहा कि एक योद्धा बनिए लेकिन अलग तरह से। पानी के योद्धा बनिए। क्या आपने कभी भी पानी की कमी के बारे में सोचा है? हममें से हर कोई सामूहिक रूप से अपने बच्चों के लिए सुरक्षित पानी वाला भविष्य बनाने के लिए कार्य कर सकते हैं। मैं इस तरह अपनी कोशिश कर रही हूं।

छोटी कोशिशें बहुत बड़ा असर डाल सकती हैं। पानी एक मूल्यवान चीज है जो हमें विरासत के तौर पर मिली है। हमारी आने वाली पीढ़ियों को इससे वंचित न होने दें। जिम्मेदारी से पानी का उपयोग, वर्षा जल का संचयन करें, झीलों को बचाएं, उपयोग किए गए पानी को रिसाइकिल करें और जागरूकता पैदा करें। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं चिड़ियों को वापस किसी झील में ला सकती हूं या प्रधानमंत्री के अकाउंट से ट्वीट कर सकती हूं। दृढ़ संकल्प के साथ असंभव को प्राप्त किया जा सकता है। हम जल संसाधनों के प्रबंधन पर सामूहिक कार्रवाई के साथ समुदायों में बदलाव ला सकते हैं। आइये हम परेशानी को खत्म करने वाले बनें।

विजया की विजयगाथा अब जानेगा पूरा देश
कल्पना रमेश के बाद प्रधानमंत्री का ट्विटर अकाउंट संभालने वाली पांचवी महिला का नाम विजया पवार है। अपना परिचय देते हुए उन्होंने लिखा: आप सभी ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों के हस्तशिल्प के बारे में सुना होगा। मेरे साथी भारतीयों के साथ मैं आपके सामने ग्रामीण महाराष्ट्र में बंजारा समुदाय के हस्तशिल्प प्रस्तुत करती हूं। मैं पिछले दो दशकों से इस पर काम कर रही हूं और हजारों महिलाएं इस काम में मेरा साथ दे रही हैं।

गोरमाटी कला को बढ़ावा देने के लिए नरेंद्र मोदी जी ने न केवल हमें प्रोत्साहित किया बल्कि हमारी आर्थिक सहायता भी की। ये हमारे लिए गौरव की बात है। इस कला के संरक्षण के लिए मैं पूरी तरह से समर्पित हूं और महिला दिवस के अवसर पर गौरवान्वित महसूस कर रही हूं।

खुले से शौच से मुक्‍ति को कलावती ने छेड़ा आंदोलन
कानपुर की कलावती देवी ने अपने क्षेत्र के लोगों को हजारों शौचालय बनाने के लिए पैसे दान करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने ट्वीट किया, मैं जिस जगह पे रहती थी, वहां हर तरफ गंदगी ही गंदगी थी। लेकिन दृढ़ विश्वास था कि स्वच्छता के जरिए हम इस स्थिति को बदल सकते हैं। लोगों को समझाने का फैसला किया। शौचालय बनाने के लिए घूम-घूमकर एक-एक पैसा इकट्ठा किया। देश की बहन, बेटी और बहुओं को मेरा यही संदेश है कि समाज को आगे ले जाने के लिए ईमानदारी से किया गया प्रयास कभी निष्फल नहीं होता। इसलिए बाहर निकलिए। अगर कोई कड़वी भाषा बोलता है तो उसे बोलने दीजिए।  अगर अपने लक्ष्य को पाना है तो पीछे मुड़कर नहीं देखा करते हैं।

वीणा ने मशरूम की खेती से बदली सैकड़ों महिलाओं की जिंदगी
मुंगेर की वीणा देवी ने मशरूम की खेती करने की पहल की और अन्य महिलाओं को भी इस काम में अपने साथ जोडकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया। उन्होंने ट्वीट किया, जहां चाह वहां राह इच्छाशक्ति से सब कुछ हासिल किया जा सकता है। मेरी वास्तविक पहचान पलंग के नीचे एक किलो मशरूम की खेती से शुरू हुई थी, लेकिन इस खेती ने मुझे न केवल आत्मनिर्भर बनाया, बल्कि मेरे आत्मविश्वास को बढ़ाकर एक नया जीवन दिया। आज महिलाएं किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं। अगर देश की नारी शक्ति ठान ले तो घर के अपने कमरे से ही अपनी यात्रा शुरू कर सकती है। इसी खेती की वजह से मुझे सम्मान मिला। मैं सरपंच बनी। मेरे लिए खुशी की बात है कि अपने जैसी कई महिलाओं को ट्रेनिंग देने का अवसर भी मिल रहा है। आज मुंगेर की महिलाएं पूरे देश के सामने एक मिसाल पेश कर रही हैं। घर में खेती से लेकर उपज को हाट में बेचने तक सारा जिम्मा खुद अपने कंधों पर उठाती हैं। इसलिए मैं देश की सभी महिलाओं से यही कहूंगी- बाहर निकलिए, खुद काम कीजिए और तब देखिए कितना अच्छा लगता है।

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