‘द कैंसर वार्ड’…प्रथम भाग: राघवेन्‍द्र विक्रम सिंह

The Cancer Ward: आज 11फरवरी का दिन प्रायः याद आ जाता है.
बीएचयू के मेडिकल कालेज के आपरेशन थियेटर में 17 साल पहले आज के दिन मेरा आपरेशन चल रहा था. डा. एच. एस. शुक्ला आंकोलॉजी के हेड आफ डिपार्टमेंट सर्जरी कर रहे थे. आंतों का कैंसर दूसरे स्टेज पर था. अचानक जनवरी की अंतिम तारीख़ों में यह बीमारी कन्फर्म हुई. अंदाजा ही नहीं था कि पिछले करीब एक साल से चल रही पेट की समस्या कैंसर में तब्दील हो चुकी है. वजन 80 से गिरते गिरते 70 फिर 65 पर आ गया. भूख पूरी तरह खत्म हो गई थी.
THE CANCER WARD
बीएचयू के गैस्ट्रो विभाग के डाक्टरों ने ब्लड टेस्ट, बाडी स्कैन, एण्डोस्कोपी कराई तो कैंसर पता चला. लगा कि दुनिया बदल गई हो. चिंता यह हुई कि कितना वक्त है हमारे पास. तब मैं वाराणसी विकास प्राधिकरण में था. शाम को डा़ शुक्ला के यहां गये. उन्होंने एक्जामिन किया. मैंने पूंछा कि कितना समय होगा मेरे पास ? यह तो मैं पेट खोलने के बाद ही बता पाऊँगा कि कितना और किन अंगों में फैल चुका है.

  पत्नी को मैं जहां तक संभव बताना नहीं चाह रहा था. घर पहुंचने पर थोड़ी देर में ही पत्नी ने ताड़ लिया कि कोई गंभीर बात है. बताइये क्या है ?
 कैंसर बताया है आंत का. 
शाक, अविश्वास … संभव ही नहीं. हमनें कोई बुरा नहीं किया किसी के साथ … ऐसा कैसे हो सकता है ? नहीं नहीं. कुछ नहीं होगा.
डाक्टर एन पी सिंह को मिलाया पत्नी ने. वे साथ थे दिनभर. उन्होंने पत्नी को बतायी सारी बात. कल एक दो टेस्ट के लिये जाना है. लटकाना ठीक नहीं. जल्दी से जल्दी आपरेशन यहीं. शुक्ला सर से अच्छा कोई नहीं. पत्नी ने कमांड संभाल ली थी. कब एडमिशन होगा, कब आपरेशन. नहीं टाटा बाम्बे नहीं जाना है. किसी को बताना नहीं है. माता पिता को तो बिल्कुल ही नहीं.

दूसरे दिन बी एच यू से वापस आते वक्त रास्ते में संकटमोचन हनुमानजी के मंदिर पर रुका.शायद पहली बार अकेले. हमें कभी ईश्वर की जरूरत भी नहीं पड़ी थी. अंदर जाकर हनुमानजी के सामने खड़ा हुआ. सब बिखरा हुआ है. क्या होगा पत्नी बेटे का ? भाइयों का ? माता पिता का ? ननिहाल का मुकदमा चल रहा है. कोई अंत नहीं. विरोधियों की तो पौ बारह हो जाएगी. रक्षा कीजिए. मुझे प्रार्थना करना भी नहीं आ रहा था. अंत में यह कह कर वापस हो गया कि हे प्रभु, क्या पांच साल का समय नहीं मिल जाएगा ?

दूसरे ही दिन बिना किसी को बताए सर सुन्दरलाल अस्पताल में भरती हो गया. हमारे कालेज के मित्र डा. महेंद्र जो बी एच यू में आई सर्जन हैं, ने ढाढस बंधाया, साथ रहे लेकिन चिंताएं दिखती हैं छिप नहीं पातीं. डा. शुक्ला दो दिन के लिए लंदन गये थे. वापस आये और आज के दिन आपरेशन हुआ.करीब एक फिट का बड़ी आंत का प्रभावित भाग और ब्लैडर का एक तिहाई हिस्सा काट कर निकाल दिया गया.

तब से आज 17 साल बीत गये. रिकवरी बहुत तेज हुई. तीन महीनें में ही जीवन सामान्य सा हो गया. पत्नी और डा. एन पी सिंह ने हमें बलपूर्वक पूर्ण शाकाहारी बना दिया, साथ ही गांधीगीरी करते हुए सभी शाकाहारी हो गये. पत्नी ने जबरदस्त जीवटता का परिचय दिया … पूरे संघर्ष में कहीं से कमजोर नहीं पड़ी ..यह विश्वास तो बिल्कुल भी नहीं टूटा कि हमें कुछ नहीं होगा.
RAGHVENDRA VIKRAM SINGH
… शेष कल.
(इस घटना से जुड़े कुछ ज्योतिषीय व आध्यत्मिक से अनुभव हैं, उन्हें भी साझा करना चाहूंगा कल अगले पोस्ट में.)

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