‘भय से मुक्त रहें क्योंकि भय सबसे बड़ा पाप है. मन को हमेशा प्रसन्न रखो. मृत्यु तो अपरिहार्य है, उससे भय कैसा. कायरों को मृत्यु का भय सदैव द्रवित करती है.’ उन्होंने इस डर को दूर करने का आग्रह किया और कहा, ‘आओ, हम इस झूठे भय को छोड़ दें और भगवान की असीम करुणा पर विश्वास रखें. अपनी कमर कस लें और सेवा कार्य के क्षेत्र में प्रवेश करें. हमें शुद्ध और स्वच्छ जीवन जीना चाहिए. रोग, महामारी का डर, आदि, ईश्वर की कृपा से विलुप्त हो जाएगा.

स्वामी विवेकानंद, प्लेग मैनिफेस्टो 

हर दौर में दुनिया में ऐसी कई ऐतिहासिक शख़्सियतें हुई हैं, जिन्होंने अपेक्षाकृत कम उम्र में ही समाज में हलचलें पैदा कर दीं.

सुदूर अतीत में ईसा मसीह और शंकराचार्य हुए जिनका जीवनकाल बहुत छोटा रहा. हाल के इतिहास में छोटी उम्र के बड़े क्रांतिकारियों में भगत सिंह, मार्टिन लूथर किंग जूनियर और स्वामी विवेकानंद जैसे उदाहरण सामने आते हैं.

स्वाभाविक है कि यदि छोटे से जीवन में बड़े काम हुए हैं, तो उनका जीवन भी नाटकीय घटनाओं से भरा रहा होगा. परिस्थितियों के मारे उनमें तेजी से आनेवाले बदलावों की एक श्रृंखला रही होगी. उनके व्यक्तित्व का कोई ऐसा अनोखा पहलू रहा होगा, जो उन्हें अपने समकालीनों से अलग करता होगा. यह सब कुछ मिलकर उनके जीवन को किंवदंती बनाता होगा.

39 वर्ष के उनके जीवनकाल के अंतिम दस वर्ष लगातार भ्रमण और सार्वजनिक उद्बोधन वाले रहे. पश्चिम बंगाल के बेलुड़ मठ में 4 जुलाई, 1902, को ध्यानावस्था में उन्होंने आखिरी सांस ली थी। महज 39 साल की उम्र में वह इस दुनिया से विदा हो गए थे। लेकिन लगभग नास्तिकता के कगार पर पहुंच चुके नरेंद्र के आध्यात्मिक विवेकानंद बनने की प्रक्रिया को समझे बिना हमें उनकी सच्ची थाह नहीं मिल सकती. एक भावुक, जिद्दी और जोशीले, लेकिन आजीवन तनावग्रस्त रहने वाले युवक को गेरुआधारी स्वामी या अष्ट-सिद्धियां प्राप्त कर लेने वाले चमत्कारी महामानव के रूप में ही देखने से हम अभिभूत भले हो जाएं, लेकिन उनके व्यक्तिगत, सामाजिक और आध्यात्मिक अनुभवों का लाभ हम नहीं ले पाएंगे.

स्वामी विवेकानंद को हिंदुत्ववादी तो अपना मानते ही हैं, कुछ वामपंथी और कट्टर धर्मनिरपेक्ष लोग भी उन्हें कट्टर हिंदुत्व के व्याख्याकार की तरह देखते हैं.

दूसरी ओर कई उदार लोग स्वामी जी को उदार और प्रगतिशील हिंदूधर्म का व्याख्याकार मानते हैं जो अपने विचारों में काफी क्रांतिकारी हैं, जातिप्रथा के विरोधी हैं और महिला अधिकारों के समर्थक हैं. इस मायने में वे गांधी और ऐसे ही लोगों के पूर्ववर्ती जान पड़ते हैं. ‘शूद्रों का समाजवाद’ जैसा उनका लेखन इस धारणा को मजबूती देता है.

इसलिए यह जांचना दिलचस्प होगा कि वास्तविक विवेकानंद कैसे थे.?  इसके लिए हमें उनके समय में लौटना होगा. विवेकानंद का वक्त सन 1857 की नाकाम क्रांति के बाद का अंधेरा दौर है. अंग्रेज़ों की देश पर पकड़ मज़बूत हो चुकी थी और भारत को लूटने का उनका अभियान पूरे ज़ोरों पर था. देश में ग़रीबी, पस्ती और पराजय का माहौल था. ऐसे में भारतीयों में यह धारणा मज़बूत हो रही थी कि अंग्रेज़ और उनकी संस्कृति श्रेष्ठ है इसीलिए वे राज कर रहे हैं. अंग्रेज़ अधिकारी और ईसाई मिशनरी लोगों को यह बता रहे थे कि भारतीय परंपरागत ज्ञान और धर्म में कोई सार नहीं है. बल्कि हिंदू धर्म में जो कुछ अच्छा है वह ईसाइयत के प्रभाव में आया है. मसलन गीता इसलिए श्रेष्ठ है कि संभवत: कृष्ण ईसा से प्रभावित थे.

विवेकानंद के सामने चुनौती बड़ी थी. उन्हें हिंदू धर्म की एक प्रगतिशील, उदार और आधुनिक व्याख्या करनी थी. साथ ही दुनिया और अपने देश को बताना था कि यह परंपरा कितनी गौरवशाली है. इसके साथ समाज की सेवा करने के लिए एक संगठन भी बनाना था.और इस सब के लिए ज्यादा वक्त नहीं था. यह सब अभी करना था.

विवेकानंद को बहुत कम उम्र मिली. कुल 38 वर्ष. वे देखने में बहुत मज़बूत कदकाठी के लगते थे लेकिन, जीवन के कष्टों ने उनके शरीर को जर्जर कर दिया था. उन्हें कम उम्र में ही मधुमेह हो गया था जिसने उनके गुर्दे ख़राब कर दिए थे. उन्हें सांस की भी बीमारी थी. इन्हीं बीमारियों ने उनकी असमय जान ली. बीमारियां, आर्थिक अभाव, उपेक्षा और अपमान झेलते हुए वे लगातार गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए अथक मेहनत करते रहे.

पश्चिमी दर्शनशास्त्र को खूब चाव से चाटकर पढ़ जानेवाले नरेंद्र को उसमें भी कोई समाधान नजर नहीं आ रहा था. वह थक-हार कर बार-बार रामकृष्ण देव के पास पहुंच तो जाता, लेकिन उनके तौर-तरीकों पर उसको श्रद्धा नहीं बन पाती.

पिता की अचानक मृत्यु के बाद एक बीए पास बेरोजगार नरेंद्र पर पारिवारिक जिम्मेदारियों का पहाड़ टूट पड़ता है. खर्चीले ठाट-बाट में रहने वाले पिता एक मकान के अलावा कुछ भी संपत्ति छोड़कर नहीं जाते हैं. घर का खर्च, दो छोटे भाई और एक बहिन की परवरिश और फिर अपना सामाजिक स्टेटस बनाए रखने का दबाव उसे बेचैन कर देता है. रही-सही कसर तब पूरी हो जाती है जब खानदान ही एक व्यक्ति उसके परिवार को बेघर करने के लिए मुकदमा दायर कर देता है. उसे और उसके परिवार को कई बार भूखा तक रहना पड़ता है. नरेंद्र तो कई बार भूख के मारे बेहोश तक हो जाता. वह नंगे सिर और नंगे पैर दिन भर कलकत्ते में नौकरी के लिए दर-दर भटकता और शाम को खाली हाथ टूटे मन से घर लौट आता है.

ये दुष्कर परिस्थितियां कभी-कभी तो नरेंद्रनाथ में इतना द्रोहभाव भर देतीं कि वह बिल्कुल ही नास्तिक हो जाता. और जब विपत्ति में कुछ नहीं सूझता तो तर्कवादी नरेंद्र एक सामान्य आस्तिक की भांति रामकृष्ण देव के पास जाकर हाथ जोड़कर कहता – ‘गुरुदेव! कालीजी से निवेदन कर दीजिए कि हमारे मां, बहिन, भाई को दो दाने खाने को मिलने लगें.’

स्वामी विवेकानंद अपने पूरे जीवनकाल में ‘मनुष्य निर्माण’ के कार्य में लगे रहे. उनके अनुसार यह मनुष्य निर्माण का कार्य ही भारत को पुनः जगायेगा और एक बार फिर से हमारी प्राचीन भारत माता नवयौवन प्राप्त करके कही अधिक भव्य दीप्ती के साथ अपने सिंहासन पर बैठेगी. अगर हम आधुनिक भारत के इतिहास के पन्ने पलटते है, तो 1857 के विद्रोह के बाद अगर कोई सबसे महत्वपूर्ण घटना घटी है, तो वो है स्वामी विवेकानंद का 11 सितम्बर 1893 को शिकागो में हुए विश्व धर्म महासभा में दिया हुआ भाषण, जहां वो भारतीय दर्शन ,संस्कृति और सभ्यता को विश्व के सामने रखते हैं

भारत भ्रमण पर निकलने के बाद जब विवेकानंद ने एक तरफ धार्मिक मठों और मंदिरों की अन्यायकारी व्यवस्था देखी, और दूसरी ओर देश के गरीबों और दबे-कुचलों की दयनीय स्थिति देखी, तो उनका हृदय करुणा से भर गया. लेकिन स्वयं अपने जीवन में जिस ताप से उनका रोम-रोम जल चुका था, वह उनके हृदय में कहीं न कहीं गड़ा हुआ था. इसलिए यथास्थिति पर जब भी उनका मुंह खुलता, तो कठोर भाषा ही निकलती. अप्रिय परिस्थितियां पैदा करने वाले लोगों और संगठनों के लिए उनके मुंह से ‘कीड़ों’, ‘कायरों’, ‘मूर्ख’ और ‘सड़े-गले मुर्दों’ जैसे शब्द ही आम तौर पर निकला करते.

विवेकानंद को अपने भारतीय होने पर बेहद गर्व था। भारतीयों के गुणों का बखान करते हुए उन्होंने कहा था, ‘हम भारतीय केवल सहिष्णु ही नहीं हैं। हम सभी धर्मों से स्वयं को एकाकार कर देते हैं। हम पारसियों की अग्नि को पूजते हैं। यहूदियों के सिनेगॉग में प्रार्थना करते हैं। मनुष्य की आत्मा की एकता के लिए तिल-तिलकर अपना शरीर सुखाने वाले महात्मा बुद्ध को हम नमन करते हैं। हम भगवान महावीर के रास्ते के पथिक हैं। हम ईसा की सलीब के सम्मुख झुकते हैं। हम हिन्दू देवी देवताओं के विश्वास में बहते हैं।’
स्वामी विवेकानंद ने दुनिया के दो बड़े मजहबों, हिंदू धर्म और इसलाम की बीच आपसी सहकार की बात करते हुए कहा था, ‘हमारी मातृभूमि, दो समाजों हिंदुओं और मुसलिमों की मिलनस्थली है।’ उन्होंने कहा था,

‘मैं अपने मानस नेत्रों से देख रहा हूं कि आज के संघात और बवंडर के अंदर से एक सही और अपराजेय भारत का आविर्भाव होगा, वेदांत का मस्तिक और इसलाम का शरीर लेकर।’

भारतीय समाज की तत्कालीन दुर्दशा देखर उनपर प्रायः एक बेचैनी और अधीरता हावी रहती. इसलिए उनकी आध्यात्मिक साधना भी तत्कालीन भारत की सामाजिक जरूरतों के हिसाब से ढल गयी. यह एक बात उन्हें उस समय के सारे आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आंदोलनों से अलग करती थी. चाहे वह ब्रह्म समाज हो, आर्य समाज हो या थियोसोफिकल सोसायटी हो. पाठ करते-करते वे अचानक गीता को बंद करके एक ओर रख देते और कहते – ‘क्या होगा गीता पाठ करके’. ‘गीता’ का विलोम ‘त्याग’ चाहिए.

विवेकानंद के साहित्य का सबसे बड़ा हिस्सा जातिवाद और पुरोहितवाद के खिलाफ ही है. समाजवाद ने भी उन्हें सहज ही आकर्षित किया था. नवंबर, 1894 में न्यूयॉर्क से अलासिंगा पेरुमल को वे चिट्ठी में लिखते हैं- ‘अन्न! अन्न! मुझे इस बात का विश्वास नहीं है कि वह भगवान जो मुझे यहां पर अन्न नहीं दे सकता, वह स्वर्ग में मुझे अनंत सुख देगा. राम कहो! भारत को उठाना होगा, गरीबों को खिलाना होगा, शिक्षा का विस्तार करना होगा और पौरोहित्य की बुराइयों को ऐसा धक्का देना होगा कि वे चकराती हुई एकदम अटलांटिक महासागर में जाकर गिरें.’

जीवन के एक पड़ाव पर आकर वे वेदांत की विराटता के अनंत आनंद को महसूस करने लगे थे औऱ उसके सामने कई बार बाकी सब कुछ उन्हें तुच्छ और छोटा नज़र आने लगता. इस समय उनकी भाषा में एक अभिभावकपना भर जाता, मानो वे बाकी सबको अपना बच्चा समझ रहे हों. ‘बच्चे’, ‘मेरे पुत्रो’ ‘वत्स’ जैसे संबोधन का इस्तेमाल तो वे अक्सर ही करते थे, और ऐसा सहज होता हुआ दिखता था.

विवेकानंद लगातार सीखते रहे और बदलते रहे. उन्हें जब जो सही लगा उसे बिना लाग-लपेट के और जोरदार तरीके से कहा. इसलिए कई बार वे अपने निर्णय और विचारों को तुरंत ही पलट देते थे. उसका एक नमूना यहां दिया जा रहा है:

जून 1894 में शिकागो से शशि नाम के अपने एक गुरुभाई को वे चिट्ठी में लिखते हैं – ‘चरित्र-संगठन हो जाए, फिर मैं तुम लोगों के बीच आता हूं, समझे? दो हजार, दस हजार, बीस हजार संन्यासी चाहिए, स्त्री-पुरुष दोनों, समझे? चेले चाहिए चेले, जिस तरह भी हों. गृहस्थ चेलों का काम नहीं, त्यागी चाहिए – समझे? …केवल चेले मूड़ो, स्त्री-पुरुष जिसकी भी ऐसी इच्छा हो – मूड़ लो, फिर मैं आता हूं. बैठे-बैठे गप्पें लड़ाने और घंटी हिलाने से काम नहीं चलेगा. घंटी हिलाना गृहस्थों का काम है.’

लेकिन एक महीने के भीतर अपने इसी गुरुभाई को लिखे दूसरे पत्र में वे अपनी राय बदल देते हैं, और वह भी उतने ही जोरदार तरीके से. वे लिखते हैं –

‘हममें एक बड़ा दोष है – संन्यास की प्रशंसा. पहले-पहल उसकी आवश्यकता थी, अब तो हम लोग पक गये हैं. उसकी अब बिल्कुल आवश्यकता नहीं. समझे? संन्यासी और गृहस्थ में कोई भेद न देखेगा, तभी तो यथार्थ संन्यासी है.’

एक ओर विवेकानंद को भारतीयों के गौरव और आत्मविश्वास को जगाना था, दूसरी ओर भारतीय समाज को उसकी कमज़ोरियों और जड़ताओं से भी निकालना था और यह सब लगातार यात्राएं करते हुए और लोगों को संगठित करते हुए करना था. इसलिए स्वाभाविक है कि उनके लेखन में कई अंतर्विरोध दिखते हैं जिनका चुनिंदा इस्तेमाल करते हुए उन्हें उनके समर्थक और विरोधी दोनों उन्हें संकीर्ण हिंदुत्व का आदिपुरुष साबित करते हैं. ये अंतर्विरोध उनकी परिस्थितियों के संदर्भ में समझे जा सकते हैं.

महिलाओं के कल्याण के बारे में विवेकानंद के विचार अपने समय के नारीवादियों से कहीं आगे के थे. चीन, जापान अमेरिका और यूरोप जहां कहीं भी वे गए, उन्होंने वहां की महिलाओं की स्थिति का खासतौर पर अध्ययन और विश्लेषण किया. सिस्टर निवेदिता से संगति और लगातार बहस ने भी उन्हें महिलाओं की स्थिति समझने में मदद की. इसलिए उन्होंने भारत की महिलाओं के उत्थान के बारे में जोरदार तरीके से अपनी बात रखी.

25 सितंबर 1894 को अपने प्रिय मित्र शशि (स्वामी रामकृष्णानंद) को न्यूयॉर्क से लिखी चिट्ठी में वे कहते हैं – ‘मैं इस देश की महिलाओं को देखकर आश्चर्यचकित हो जाता हूं. …ये कैसी महिलाएं हैं, बाप रे! मर्दों को एक कोने में ठूंस देना चाहती हैं. मर्द गोते खा रहे हैं. …मैं स्त्री-पुरुष भेद को जड़ से मिटा दूंगा. आत्मा में भी कहीं लिंग का भेद है? स्त्री और पुरुष का भेदभाव दूर करो, सब आत्मा है.’

एक अन्य संन्यासी शिष्य को फटकारते हुए उन्होंने कहा था- ‘तुम लोग स्त्रियों की निंदा ही करते रहते हो, परंतु उनकी उन्नति के लिए तुमने क्या किया, बताओ तो? स्मृति आदि लिखकर, नियम-नीति में बांधकर इस देश के पुरुषों ने स्त्रियों को एकदम बच्चा पैदा करने की मशीन बना डाला है. …सबसे पहले महिलाओं को सुशिक्षत बनाओ, फिर वे स्वयं कहेंगी कि उन्हें किन सुधारों की आवश्यकता है. तुम्हें उनके प्रत्येक कार्य में हस्तक्षेप करने का क्या अधिकार है? …उन्नति के लिए सबसे पहले स्वाधीनता की आवश्यकता है. …महिलाओं के प्रश्न को हल करने के लिए आगे बढ़ने वाले तुम हो कौन? अलग हट जाओ. अपनी समस्याओं की पूर्ति वे स्वयं कर लेंगी.’

‘भारत का भविष्य’ नामक अपने व्याख्यान में वो कहते हैं- ‘शिक्षा का मतलब यह नहीं है की तुम्हारे दिमाग में ऐसी बहुत सी बातें इस तरह ठूस दी जाये कि अंतर्द्वंद होने लगे और तुम्हारा दिमाग उन्हें जीवन भर पचा न सके. जिस शिक्षा से हम अपना जीवन निर्माण कर सकें, मनुष्य बन सकें, चरित्र गठन कर सकें और विचारो का सामंजस्य कर सकें. वही वास्तव में शिक्षा कहलाने योग्य है. यदि तुम पांच ही भावों को पचा कर तदनुसार जीवन और चरित्र गठित कर सके हो, तो तुम्हारी शिक्षा उस आदमी की अपेक्षा बहुत अधिक है, जिसने एक पूरे पुस्तकालय को कंठस्थ कर रखा है.’

यह शिक्षा राष्ट्र चरित्र का निर्माण करेगी, जहां व्यक्तिगत श्रेष्ठता राष्ट और समाज के काम आए ना की व्यक्तिगत प्रसिद्धि और सफलता तक सीमित रह जाए. अगर ऐसा वातावरण विकसित होता है, तो भारत के विश्वविद्यालयों, आईआईटी,आईआईएम से सब्सिडी पर पढ़ कर विदेशों में सेवा देने वाले भारतीय वहां नहीं जायेंगे. भारत को उनकी ज़रूरत है, इसी राष्ट्र ने उनको बनाया है. इसीलिए उनको भारत की सेवा करनी होगी, लेकिन यह तभी संभव है जब राष्ट्र चरित्र का निर्माण हो ना की व्यक्तिगत लाभ और हानियों को देख कर आगे बढ़ा जाये.

गरीब और गरीबी को लेकर किस तरह का रवैया अपनाया जाना चाहिए, यह बताते हुए विवेकानंद कहते हैं,

‘हर व्यक्ति को भगवान की तरह देखो. आप किसी की मदद नहीं कर सकते, बस उसकी सेवा कर सकते हैं. अगर आपके पास अधिकार हैं तो यह समझें कि भगवान के बच्चों की सेवा खुद उसकी ही सेवा है. गरीबों की सेवा का काम पूजा भाव से करो.’

वे आगे कहते हैं, ‘जब तक करोड़ों लोग भूखे और वंचित रहेंगे तब तक मैं हर उस आदमी को गद्दार मानूंगा जिसने गरीबों की कीमत पर शिक्षा तो हासिल की लेकिन, उनकी चिंता बिल्कुल नहीं की.’

विवेकानंद की इन दो बातों से साफ है कि वे इस बड़ी समस्या का समाधान गरीबों के लेकर रवैये में बदलाव’ के रूप में दे रहे हैं. एक बड़ा वर्ग मानता है कि आज अगर देश के नीति निर्धारक गरीबों को लेकर सिर्फ अपना रवैया बदल लें तो फिर जो नीतियां बनेंगी, वे असल मायनों में गरीबपरस्त होंगी.

किसान और किसानी की समस्याओं के समाधान के बारे में स्वामी विवेकानंद कहते हैं, ‘किसानों की समस्या का समाधान शिक्षा के जरिए किया जा सकता है. भारत अब भी ज्ञान के सीमित प्रसार की राह पर चल रहा है. शिक्षा को मुट्ठी भर लोगों की जागीर बनाने से काम नहीं चलेगा. भले ही देश की 70 फीसदी आबादी अब भी गुजर-बसर के लिए कृषि पर निर्भर हो लेकिन किसान और किसानी की दुर्दशा किसी से छिपी हुई नहीं है.

देश की 51 फीसदी आबादी की उम्र 25 साल से कम है.

इस आधार पर कहना गलत नहीं होगा कि देश की प्रगति काफी हद तक युवाओं पर निर्भर करती है. लेकिन क्या इस वर्ग को वे सुविधाएं मिल रही हैं जिसके आधार पर वह सशक्त बनकर देश की प्रगति में अपनी भूमिका निभा सके. युवाओं का एक बड़ा वर्ग उसी वंचित समुदाय से है जो अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने को लेकर संघर्ष कर रहा है. आपराधिक घटनाओं में युवाओं की बढ़ती संलिप्तता पर अक्सर चिंता जताई जाती है. कहा जा सकता है कि जिस वर्ग पर देश की तरक्की का सबसे अधिक भार है, वह आज कई समस्याओं का सामना कर रहा है.

युवाओं को राह दिखाते हुए स्वामी विवेकानंद कहते हैं, ‘कोई भी समाज अपराधियों की सक्रियता की वजह से से गर्त में नहीं जाता बल्कि अच्छे लोगों की निष्क्रियता इसकी असली वजह है. इसलिए नायक बनो. हमेशा निडर रहो. यह डर ही है जो दुख लाता है और भय की वजह है अपने आसपास को नहीं समझना. कुछ प्रतिबद्ध लोग देश का जितना भला कर सकते हैं उतना भला कोई बड़ी भीड़ एक सदी में भी नहीं कर सकती. मेरे बच्चो, आग में कूदने के लिए तैयार रहो. भारत को सिर्फ उसके हजार नौजवानों का बलिदान चाहिए.’

युवाओं को सफलता का सूत्र देते हुए विवेकानंद कहते हैं, ‘कोई एक विचार लो और उसे अपनी जिंदगी बना लो. उसी के बारे में सोचो और सपने में भी वही देखो. उस विचार को जियो. अपने शरीर के हर अंग को उस विचार से भर लो. सफलता का रास्ता यही है. जब तुम कोई काम कर रहे हो तो फिर किसी और चीज के बारे में मत सोचो. इसे पूजा की तरह करो. इस दुनिया में आए हो तो अपनी छाप छोड़कर जाओ. ऐसा नहीं किया तो फिर तुझमें और पेड़-पत्थरों में अंतर क्या रहा? वे भी पैदा होते हैं और नष्ट हो जाते हैं.’

स्वामी विवेकानंद आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचारों में वर्तमान के कई ज्वलंत सवालों के जवाब ढ़ूढ़ें जा सकते हैं। ज़रूरत उन सवालों को सही ढंग से समझने की है। उन्नीसवीं सदी में जब भारतीय समाज अपेक्षाकृत ज्यादा मतांध, संकीर्ण और दकियानूस था, उस वक्त विवेकानंद ने जो कुछ भी कहा, वह हर लिहाज से क्रांतिकारी था। समाज की जरा सी भी परवाह न करते हुए, वे अपने साहसिक और मौलिक विचार पूरी दुनिया के बीच बाँटते रहे।
समग्र रूप से देखने पर विवेकानंद उस उदार, प्रगतिशील धार्मिक दृष्टि के अविष्कारक थे जिसने आधुनिक समय में हिंदू धर्म को प्रासंगिक बनाया. जिस राह को आगे गांधी और विनोबा ने प्रशस्त किया और जिसने भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाया वह राह विवेकानंद ने खोली थी और इसके लिए हमें उनका ऋणी होना चाहिए.
-प्रणव द्विवेदी
लेखक युवाओ, नेतृत्व तथा राष्ट्रवाद से जुड़े विषयो पर लिखना पसंद करते है तथा “स्वामी विवेकानंद एवं युवा नेतृत्व ” विषय पर विभिन्न संस्थानों में व्याख्यान देते है | साथ ही वे युवाओ को स्टार्टअप तथा एंट्रेप्रेनरशिप के लिए भी प्रेरित करते है |
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