यह कहानी है दुनिया भर में मशहूर जूते की कंपनी बाटा के फाउंडर थॉमस बाटा की । जिन्होंने अपने छोटे से पारिवारिक व्यवसाय को आज दुनिया भर में मशहूर कर दिया है । थॉमस बाटा के साथ उनके भाई एंटोनिन बाटा तथा बहन अन्ना बाटा ने भी इस कंपनी को बड़ा बनाने में बहुत सहयोग दिया है ।

प्रारंभिक जीवन


थॉमस बाटा का जन्म प्राग में हुआ था जो की अब चेक रिपब्लिक के नाम से जाना जाता है । उनके पिता जी चेक इंडस्ट्री में काम करते थे । उनके पिता जी ने 1894 में टी. एंड ए. बाटा शू नाम की कम्पनी ज्लिन में खोली थी और थॉमस वहां अपने पिताजी से काम सीखते थे । दुर्भाग्यवश जब थॉमस सिर्फ 17 साल के थे , उनके पिता जी ने एक विमान दुर्घटना में अपनी गवा दी थी ।

बाटा कंपनी की शुरुआत और कठिनाइयां


1894 में चेकोस्लोवाकिया के एक शहर जलिन में थॉमस बाटा ने अपने भाई एंटोनिन और बहन अन्ना के साथ मिल कर एक छोटे से जूते बनाने वाली फैक्ट्री की शुरुआत की । इसमें उनके साथ और भी 10 और भी सहयोगी काम करते थे । अपने पहले फैक्ट्री की शुरुआत करने के लिए उन्होंने अपनी मां से पैसे मांगे थे ।
पारिवारिक व्यवसाय होने के कारण थॉमस को इस काम में कुछ खास परेशानियां नहीं उठानी पड़ी लेकिन जो सपना उन्होंने देखा था उसमे मेहनत बहुत करनी थी ।


एक साल तक सब कुछ सही चला की फिर उन्हें यह एहसास हुआ की लेदर के जूते बनाने से वह घाटे में जा रहे हैं और उन्हें पैसों की कमी होने लगी है । इसलिए उन्होंने लेदर को छोड़ कैनवास से जूते बनाने शुरू कर दिए । कैनवास सस्ता और हल्का होता है जिससे थॉमस को वह किफायती पड़ते और जूते पहनने वालों को हल्के । ग्राहकों को भी उनके जूते पसंद आने लगे थे जिससे उनकी ने कंपनी लोगों के बीच नाम कमाना शुरू कर दिया था ।
कुछ समय बाद थॉमस अमेरिका गए और वहां वे बहुत सारे जूतों को एक साथ बनाने का तरीका सिख के आए ।वापस आने के बाद उन्होंने उस तकनीक को अपनाया और उनके जूतों का उत्पाद दो गुनाह हो गया ।
थॉमस को लोगों की पसंद का अच्छा ज्ञान था । इसलिए उन्होंने ऑफिस जाने वाले लोगों के लिए बाटोवकी नाम का जूता बनाया जिसे लोगों ने उनकी सादगी , शैली , हल्के वजन और कम कीमत के कारण खूब पसंद किया । बाटा कम्पनी ने अब पहले से बहुत ज्यादा नाम कमा लिया था किंतु उसी वर्ष थॉमस के भाई एंटोनियो की तबियत बिगड़ने से मृत्यु हो गई और उनकी बहन अन्ना की भी शादी हो गई थी और वह अपने घर चली गई थी । और इस कारण अब थॉमस कंपनी के अकेले संभालने के लिए मजबूर हो गए थे । लेकिन उन्होंने अब हाथ पे हाथ रख के बैठने का नहीं बल्कि और अधिक मेहनत करने के विचार को अपने मन में बसा लिया था । उन्होंने अपने छोटे भाइयों को भी इसमें शामिल कर लिया और अपने सहयोगियों की संख्या को भी बढ़ा दिया था । अब उनके पास कुल 600 सहयोगी काम करने लगे थे ।
1914 के पहले विश्व युद्ध में सेना के लिए अच्छे , हल्के और आरामदायक जूते बनाने का सबसे बड़ा ऑर्डर थॉमस को मिला जिसके वजह से उन्हें अपने सहयोगियों की संख्या को दस गुनाह बढ़ाना पड़ा ताकि सारे ऑर्डर समय तक पूरे हो सकें ।


1918 में जब विश्व युद्ध समाप्त हुआ , यह जितनी खुशी की बात थी उतनी ही दुख की भी । विश्व युद्ध खत्म होने के बाद जबरजस्त मंडी का दौर आया और इसके चपेट में बाटा भी आ गई थी । लेकिन थॉमस के पास इससे भी निपटने का एक अच्छा तरीका था । उन्होंने बाटा शूज दामों को आधा कर दिया और यही नहीं उन्होंने अपने सहयोगियों के सैलरी में भी 40% की कटौती कर दी । अच्छी बात तो यह थी की इसमें उन सभी लोगों ने उनका पूरा सहयोग किया और अपनी सैलरी में कटौती करवाने के लिए तैयार हो गए ।
थॉमस का यह विचार उनके लिए बहुत ही सफल साबित हुआ । मंडी के जिस समय में बाकी सारी कम्पनियों को बंद करने की नौबत आ गई थी वहीं बाटा शू को सस्ते और कम्फोर्टेबल जूते बनाने के हजारों ऑर्डर मिलने लगे थे ।


उस समय के बाद से बाटा कम्पनी ने बहुत तरक्की करनी शुरू कर दी और वह दुनिया की सबसे बड़ी फुटवियर ब्रांड बन गई जिससे सब लोग पहचानने लगे थे ।
बाटा शू कंपनी ने अपना हेड क्वार्टर स्विट्जरलैंड में बनाया है । आज के समय में बाटा 70 से भी ज्यादा देशों में अपनी पहचान बना चुका है और उनके 5200 खुदरा दुकानें खुल चुकी हैं ।

बाटा का भारत में प्रवेश


बाटा कम्पनी का भारत में प्रवेश करीब 90 साल पहले ही हो गया था । 1931 में बाटा ने अपनी पहली फैक्ट्री पश्चिम बंगाल के कोन्नागर में शुरू की जो बाद में बाटागंज में शिफ्ट कर दिया गया । इसके बाद उन्होंने हरियाणा के फरीदाबाद , कर्नाटक के पिनया और तमिलनाडु के होसुर जैसे और भी पांच शहरों में इसके फैक्ट्रियों का उपघाटन किया । इन सभी फैक्टरियों में चमड़े , रबर और कैनवास के मदद से आरामदायक और मजबूत जूते बनाए जाते हैं । भारत में बाटा एक ऐसी शू ब्रांड है जिसका खुद का एक लॉयल मध्यवर्गीय ग्राहक समुदाय है । भारत का यूथ इस ब्रांड को काफी पसंद करता है ।

सम्मान


थॉमस बाटा को तीन पुरस्कार से सम्मानित भी किया जा चुका है ।
1972 में उन्होंने कनाडा के चैंपियन ऑफ द ऑर्डर के रूप में निवेश किया था ।
1991 में उन्हें चेक रिपब्लिक के सबसे शीर्ष सजावट , ऑर्डर ऑफ थॉमस गैरिग मासारिक से सम्मानित किया गया ।
2003 में उन्हें रिटेल काउंसिल ऑफ कनाडा के लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया ।

थॉमस रातों रात “शू किंग” नहीं बन गए , लेकिन सिर्फ 10 सालों में उनकी कंपनी ने एक दिन में 2,200 जोड़ी जूते बनाने शुरू कर दिए थे । 1905 में उनका उत्पादन 2200 जोड़ी प्रति दिन चिन्हित किया गया तब जिसके केवल 250 कर्मचारी पूरा कर रहे थे ।
1932 में देश को अलविदा कह देने वाले थॉमस बाटा की कहानी आज भी लोगों को प्रेरित करती है । वह इस बात की सिख देते हैं की हमें अपने बुरे समय में भी अपने अच्छे के बारे मे सोचना चाहिए । हमें अपने बुरे समय को खुद पर हावी होने से रोकना चाहिए क्योंकि यही समय होता है जब हम खुद के लिए कुछ अच्छा सोच सकते हैं ।

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