डाॅ. सुभाष चंद्र गोयनका ( Dr. Subhash Chandra Goenka’s ) एक भारतीय अरबपति मीडिया बैरन हैं । वह “एस्सेल ग्रुप” के अध्यक्ष हैं । 1992 में उन्होंने ज़ी टी. वी. की भी स्थापना की थी , जो कि एक भारतीय मीडिया समूह है । 24 मई 2016 को उन्होंने ज़ी मीडिया के निदेशक और गैर–कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में इस्तीफा दे दिया था । 2016 में ही उन्हें राज्यसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के विधायकों द्वारा समर्थित एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में हरियाणा राज्य के लिए भारतीय संसद के ऊपरी सदन के लिए चुना गया था ।
डाॅ. सुभाष आज के यूथ के लिए बहुत ही बेहतर उदाहरण हैं । इन्होंने लोगो को मेहनत करने और फल की चिंता न करें की सीख दी है ।

Dr. Subhash Chandra Goenka's

यह भी पढ़े : छत्तीसगढ़ : सीएम भूपेश बघेल का सराहनीय कार्य, लखनऊ के मेदांता अस्पताल के लिए रायपुर से भेजा ऑक्सीजन टैंकर 

प्रारंभिक जीवन

सुभाष चंद्र का जन्म 30 नवंबर , 1950 में हरियाणा के हिसार जिले के आदमपुर नमक गांव में हुआ था । उनके पिता का नाम नंदकिशोर गोयनका तथा माता का नाम तारा देवी गोयनका है । वे अपने माता पिता के पहली संतान हैं उनके बाद उनकी 3 बहनें और 3 भाई भी हैं । उनकी प्राथमिक शिक्षा उनके गांव के ही एक स्कूल में हुई और 5 वीं कक्षा के बाद की पढ़ाई सी. ए. वी. स्कूल , हिसार से हुई । पढ़ाई के साथ साथ ही वह अपने दादा जी से व्यवसाय करना सीखने लगे थे जो अनाज खरीदने , बेचने और ब्याज पर पैसा देने का काम करते थे । धीरे धीरे उन्होंने ने भी यह सारी चीज़ें सिख ली थी ।


सुभाष का सपना था की वह बड़े होकर एक इंजीनियर बनें लेकिन कुछ साल बाद 1967 में उनके पारिवारिक व्यवसाय जो की एक दाल मिल का काम था में उन्हें काफी नुकसान हो गया । जिससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी और 17 साल की उम्र में उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ गया । रिश्तेदारों और दोस्तों से पैसे उधार लेते लेते उनके परिवार पर कुल 3.5 लाख रुपए कर्ज आ गया था । लेकिन पैसे कमाने का कोई दूसरा व्यवसाय नहीं था और सभी ने हिमात हर दी थी ।

यह भी पढ़े : छत्तीसगढ़ : सीएम भूपेश बघेल का सराहनीय कार्य, लखनऊ के मेदांता अस्पताल के लिए रायपुर से भेजा ऑक्सीजन टैंकर 

लेकिन सुभाष ने हिम्मत हारने के बजाए इस तकलीफ से लड़ने का फैसला लिया और खुद की बुद्धिमानी से उसी व्यवसाय को फिर से चलाने का सोचा और कड़ी मेहनत कर के धीरे धीरे उसे बढ़ाने लगे और मार्केट में दुबारा से कदम रखा । यह समय उनके और उनके परिवार के लिए काफी कष्ट दायक था लेकिन उन्होंने हिम्मत से इसे कर दिखाया । 1969 में उनकी मुलाकात फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एफ. सी. आई.) के मैनेजर से हुई । एफ. सी. आई. भारतीय सेना को अनाज , दाल और ड्राई फ्रूट्स पहुंचाने का काम करता था । लेकिन वह इसे करने मे असक्षम साबित हो रहे थे इसलिए उन्होंने सुभाष को दलों की पॉलिशिंग और सफाई का काम सौंप दिया और यह काम उनके लिए बहुत ही लाभ दायक साबित हुई । इस काम के मिलने के बाद से उनके परिवार की आर्थिक स्थिति कुछ सही होने लगी थी ।


1971 में सुभाष जेब में 17 रुपए लिए दिल्ली आ गए और एक दाल मिल किराए पर ले कर चलाने लगे । इस बीच उन्होंने और भी कई व्यवसाय किए ।1971 में सुभाष को एक और सफलता मिली जब एफ. सी. आई. 14 मिलियन टन अनाज को स्टोर करने के लिए एक बड़ी जगह खोज रही थी और सुभाष ने उन्हें एक छोटा सा सुझाव दिया जो की सभी को पसंद आया । इनका सुझाव था की अनाज को पन्नियों से ढंक कर खुले में भी स्टोर किया जा सकता है । इस सुझाव के बाद सुभाष को ही इसे स्टोर करने का कॉन्ट्रैक्ट मिल गया ।
काम करते करते जब उनके पास पर्याप्त पैसे आ गए , तो उन्होंने दवाइयों की लेमिनेशन और खाली कैप्सूल बनाने की भी फैक्ट्री लगाई ।

यह भी पढ़े : छत्तीसगढ़ : सीएम भूपेश बघेल का सराहनीय कार्य, लखनऊ के मेदांता अस्पताल के लिए रायपुर से भेजा ऑक्सीजन टैंकर 


1981 में भारत और सोविएत यूनियन (यू. एस. एस. आर.) के बीच में रेड समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे , जिसके कारण सुभाष के रामा असोसिएशन ने यू. एस. एस. आर. को चावल निर्यात करने के लिए एक आकर्षक सौदा जीता , जिसके बाद 30,000 टन चावल का निर्यात शुरू हुआ और बाद में सोयाबीन और अनाज की बिक्री भी चालू हुई और उन्हे इससे बहुत फायदा मिला

एस्सेल ग्रुप की शुरुआत


1982 में उन्होंने एस्सेल पैकेजिंग कम्पनी की स्थापना की जो की एल्यूमीनियम टूथपेस्ट पैकेजिंग को लैमिनेटेड या सॉफ्ट स्क्वीसी ट्यूब्स में बदलने का काम करने लगी ।
काम कोई भी हो शुरुआत में आपको मुश्किलों का सामना करना ही पड़ता है और वैसे ही इस कंपनी ने भी मुश्किलों और नुकसानों को झेलने के बाद आखिर में तरक्की करना शुरू कर दिया था । और आज यह 13 देशों में अपने प्रोडक्ट्स का निर्यात करती है और एक बड़ी लैमिनेटेड ट्यूब निर्माता बन गई है जिसका नाम अब “एस्सेल प्रोपैक लिमिटेड” है ।
1989 में उन्होंने मुंबई के गोराई में 753 एकड़ ज़मीन ले कर वह “एस्सेल वर्ल्ड” की स्थापना की जो की एक एम्यूजमेंट पार्क है ।

यह भी पढ़े : छत्तीसगढ़ : सीएम भूपेश बघेल का सराहनीय कार्य, लखनऊ के मेदांता अस्पताल के लिए रायपुर से भेजा ऑक्सीजन टैंकर 

ज़ी चैनल की स्थापना


1990 में सुभाष को दूरदर्शन के ऑफिस में जाने का मोका मिला जहां से वह प्रेरित होकर लौटे और उन्होंने खुद का एक निजी चैनल लॉन्च करने का विचार किया । किंतु भरता में बिना किसी कानूनी तौर तरीके से आप अपना कोई चैनल लॉन्च नहीं कर सकते हैं । इसलिए उन्होंने दूसरा विकल्प चुना , उन्होंने हॉन्गकॉन्ग के माध्यम से ज़ी टी. वी. नाम का प्राइवेट सैटेलाइट चैनल शुरू किया ।और बहुत जल्द ही यह भारत के करीब 1,20,00,000 घरों में देखा जाने लगा । बाद में ज़ी समूह ने इसके और भी कई चैनल शुरू कर दिए जैसे ज़ी सिनेमा और ज़ी न्यूज ।


लेकिन चीज़ें तब डरावनी हो गईं जब 1993 में न्यूज कॉर्प के अध्यक्ष रूपर्ट मर्डोक ने स्टार में 63% की हिस्सेदारी खरीद ली । हालांकि शुरू में सुभाष इस व्यापार को लेकर बिलकुल चिंतित न थे लेकिन जब उन्हें पता चला की इस चैनल को 1,20,00,000 घरों में देखा जाता है तो उन्होंने अपना एन्टे अप करने का फैसला लिया । स्टार और ज़ी के बीच शेयरहोल्डर समझौते में स्पष्ट रूप से कहा गया था की स्टार केवल अंग्रेजी सामग्री पर ध्यान केंद्रित करेगा , लेकिन शर्तों को तोड़ते हुए , स्टार ने हिंदी सामग्री को भी स्ट्रीम करना शुरू कर दिया।

जिससे उनके बीच के संबंधों में गंभीर रूप से खट्टास आ गई थी । मर्डोक ने ज़ी को धमकाना भी शुरू कर दिया था । जिसके बदले में सुभाष ने लंदन में मुकदमा दायर किया और अंततः 1998 में सुभाष ने मर्डोक की एशिया टुडे और साइटिक के शेयर के लिए 180 मिलियन डॉलर का भुगतान किया और एक अंतिम अंत में साझेदारी आई ।और तब से ज़ी या एस्सेल ग्रुप ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा

सम्मान
डॉ. सुभाष चन्द्र को 2011 में इंटरनेशनल एमी डायरेक्टरेट अवार्ड और कनाडा इंडिया फाउंडेशन , चंचलानी ग्लोबल इंडियन अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है ।

उन्होंने ने अपने दादा जी से तीन महत्वपूर्ण बातें सीखी हैं ।

  1. कभी डरना नहीं ।
  2. किसी बात का कमिटमेंट करने के बाद उससे पीछे नही हटना चाहिए ।
  3. हमेशा सच के साथ चलो ।
    वह इन तीनों बातों को अपने जीवन में अपनाते चले आ रहे हैं और इन्ही को अपना मार्गदर्शक बना लिया है ।
    सुभाष चन्द्र जी का ऐसा मानना है की जब इंसान के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं होता तभी जीतने की सच्ची शुरुआत होती है । और इसी आत्मविश्वास से उन्होंने बहुत कुछ हासिल कर लिया है ।
Follow Us