भारत के अंदर बीते कुछ सालों में युवाओं को मानसिक समस्याओं ( depression disease ) का शिकार देखा गया है जिस पर साफ बात यह निकल कर आती है कि भारत के अंदर युवा मानसिक रोग यानी डिप्रेशन का शिकार ( depression disease )होते जा रहे हैं, इस बीमारी की चर्चा और इलाज बाकी मारियो जैसा नहीं है क्योंकि भारतीय समाज के अंदर इस मानसिक रोग और रोग से जुड़ी समस्याओं पर बात करने में आज के दौर में भी शर्म की बात मानी जाती है लोग इसके बारे में खुलकर बात नहीं करना चाहते यही कारण है कि भारत के अंदर युवाओं को यह बीमारी अंदर ही अंदर खोखला करने लगती है और इंसान के मस्तिष्क पर सवार हो जाती है।

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भारत के अंदर ऐसे ही मामले जब ग्रामीणों में दिखते हैं तो वहां पर इन पर बिल्कुल भी बात नहीं करी जाती है शहरों में तो फिर भी थोड़ा बहुत इलाज देखने को मिल जाता है लेकिन ग्रामीण इस बीमारी को बीमारी नहीं मानते और इस पर बिल्कुल ध्यान नहीं देते हैं, भारत तेजी से प्रगति कर रहा है लेकिन डिप्रेशन की बीमारी भी चुपके-चुपके भारत के अंदर अपने पैर फैला रही हैं।

ऐसा हम इसलिए कह सकते हैं क्योंकि जो आंकड़े बीते कुछ सालों में निकल कर सामने आए हैं वह सच में हैरान कर देने वाले हैं आंकड़े बताते हैं कि दशकों में बदले परिवेश आधुनिक जीवन शैली तत्कालीन विफलता और बढ़ती बेरोजगारी के कारण भारत की युवाओं के अंदर डिप्रेशन की समस्या आम होती जा रही थी इसी बीमारी के चलते भारत के युवा आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाते हैं और अक्सर आत्महत्या का कारण डिप्रेशन ही के सामने आता है।

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क्या कहते हैं आंकड़े?

एनसीबी यानी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो से मिली जानकारी की मानें तो 2019 में 139,123 लोगों ने आत्महत्या की जिस में बेरोजगारों की संख्या 14019 थी अगर इन आंकड़ों की तुलना साल दो हजार अट्ठारह की जाए तो इसमें लगभग 8% अधिक है। साल 2020 में एनसीबी काफी चर्चा में रही थी जिसका कारण था बॉलीवुड के जाने माने अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या कहा जा रहा था कि सुशांत सिंह राजपूत भी डिप्रेशन के शिकार थे जिसके चलते उन्होंने आत्महत्या कर ली।

वहीं अगर विश्व स्वास्थ संगठन यानी डब्ल्यूएचओ के भारत को लेकर जारी किए गए आंकड़ों की बात करें तो करीब 23 लाख लोगों को तत्कालीन तौर पर मानसिक स्वास्थ्य संबंधी देखभाल की जरूरत है , लेकिन भारत के अंदर मानसिक सेवाओं का फिलहाल बुरा हाल है देश की सवा अरब से ज्यादा आबादी के लिए करीब 5000 मानसिक रोग के कक्ष काले हैं जबकि 2000 मानसिक स्वास्थ्य क्लीनिक है इतनी बड़ी जनसंख्या में सिर्फ इतनी गिनती के स्वास्थ्य संबंधी चिकित्सक उपलब्ध हैं यह भारत के हाल को बखूबी दर्शाता है।

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वहीं अगर भारत के अंदर मानसिक रोगियों की देखभाल के लिए सरकार द्वारा लाए गए बजट की बात करें तो मात्र 0.6% आवंटन दिया जाता है बांग्लादेश में भारत के मुकाबले यह बजट काफी ज्यादा है। इसी को लेकर लैंसेट ने एक रिसर्च पेपर जारी किया था उसमें इस बात का जिक्र किया गया था कि प्रत्येक 7 में से एक व्यक्ति मानसिक रोग का शिकार होता है लेकिन मानसिक रोग से जूझ रहे लोगों को इलाज बड़ी मुश्किल से मिलता है।

युवाओं की आत्महत्या दर सबसे ज्यादा

विश्व स्वास्थ्य संगठन कहता है कि भारत के अंदर सबसे ज्यादा मानसिक रोगी रहते हैं देश के युवाओं को आत्महत्या की दर सबसे ज्यादा है सिर्फ इतना ही नहीं 9% भारतीयों में डिप्रेशन की समस्या उन्हें विकलांग बना देती है नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे 2015 16 में अध्ययन किया गया था कि करीब 7 पॉइंट 5 प्रतिशत भारतीय किसी न किसी मानसिक रोग से ग्रस्त रहते हैं जबकि 20 में से कम एक डिप्रेशन का शिकार होता है। फिलहाल भारत के अंदर डिप्रेशन के शिकार युवा ज्यादा हो रहे हैं।

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क्यों होता है युवाओं में डिप्रेशन ?

21वीं सदी में युवा पहले के जमाने के युवाओं से बहुत ज्यादा अलग है फिर चाहे वह सोचती हो या फिर रहन-सहन की बात आजकल युवाओं की आंखों में सुनहरे सपने होते हैं लेकिन जमाने की ठोकर उन सपनों को साकार होने से पूर्व ही तोड़ देती युवा बनना चाहते हैं और कुछ पर विवश हो जाते हैं यही मानसिक तनाव की शुरुआत हो जाती है और युवाओं में सबसे ज्यादा ऐसे ही मामले देखने को मिलते हैं जहां युवा मानसिक पीड़ा के शिकार हैं।

जब किसी चीज को हासिल करने के लिए पूरा तन मन और धन लगा देते हैं और उसके बाद भी जब वह चीज हासिल नहीं होती तो युवाओं का मन असंतुष्ट हो जाता है और मानसिक संतुलन गड़बड़ा जाता है। वर्तमान युग में लड़का हो या लड़की सभी आत्मनिर्भर होना चाहते हैं मगर भारत के अंदर बेरोजगारी की समस्या हर वक्त के लिए अभिशाप बन कर सामने आ चुकी है मध्यम वर्ग के लिए तो यह स्थिति अत्यंत कष्ट दाई होती है जब इस प्रकार की स्थिति हो जाती है तो जीवन में आए तनाव से मुक्ति पाने के लिए आत्महत्या एक ही मार्ग हमारे भारत के युवाओं को नजर आता है।

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कहा जाता है कि महिलाओं की स्थिति भारत के अंदर युवाओं से काफी खतरनाक है, वक्त से छोड़ा पीछे जाएं और आंकड़ों पर देखें तो पता चलता है कि साल 2012 की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत की तकरीबन 50 फीसद महिलाएं मानसिक विचारों की शिकार बनी विश्व स्वास्थ संगठन के आंकड़ों पर गौर करें तो हम पाते हैं कि हर पांच में से एक और 12 में से एक पुरुष मानसिक तनाव का शिकार होता है।

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मिली जानकारी की माने तो डिप्रेशन से जूझ कर आत्महत्या करने वाले युवाओं की संख्या उत्तर भारत के बजाय दक्षिण भारत में ज्यादा है आत्महत्या से होने वाली मौतों में 40 फीसद अकेले चार बड़े दक्षिण राज्यों में होती है। यह बात किसी से छुपी नहीं है कि शिक्षा का प्रतिशत दक्षिण में उत्तर से कहीं ज्यादा है और बाहर रोजगार के भी बेहतर विकल्प है इसके बावजूद यहां तनाव और अवसाद के चलते आत्महत्या जैसे समाचार सुर्खियों में बने रहते हैं।

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