बाघों के इस कुनबे को जंगल नहीं, खेत पसंद हैं महीनों से गन्ने के खेत और बागों में रह रहा बाघों का कुनबा

वन विभाग के कागजों में कुनबे का नाम किया केन टाइगर अफसरों से कहा, 8 से 10 हो गई है केन टागइरों की संख्या

बरेली। पीलीभीत टाइगर रिजर्व के कुछ बाघों को जंगल की शांति और जमीन रास नहीं आ रही। यह बाघ जंगल से सटे खेतों और बागों को अपना ठिकाना बना रहे हैं। ऐसे बाघों पर तीन साल से अधिक समय तक शोध करने के बाद वन विभाग ने उन्हें केन टागइर नाम दिया है। विभाग के मुताबिक शुरुआत में कुछ ही केन टागइर थे मगर अब इनकी तादात 12 से 15 के बीच हो चुकी है। बाघों के आचरण में आया यह बदलाव वन विभाग के साथ-साथ वन्य जीव विशेषज्ञों के लिए भी चौंकाने वाला है। वो मान रहे हैं कि जंगल और खेतों के बीच की दूरी खत्म होने से ऐसा हुआ है।

बराही और महोफ रेंज में रहता है कुनबा
टाइगर रिजर्व एरिया के महोफ रेंज और बराही रेंज के डयूनीदाम और बनौर गांव के आसपास केन टाइगर रहते हैं। इन टाइगरों पर रिसर्च करने को डब्ल्यूटीआई (वाइल्ड लाइफ टूरिस्ट) की टीम भी अध्ययन कर चुकी हैं। एक महीने तक महोफ और बराही रेंज में रहकर केन टाइगरों पर अध्ययन किया। वाइल्ड लाइफ लखनऊ और दिल्ली की टीम भी केन टाइगरों पर अध्ययन किया। अध्ययन में विशेषज्ञ ने पाया कि जो केन टाइगर हैं, वे जंगल में रहने वाले टाइगर की अपेक्षा शांत प्रिय हैं। अक्सर इंसान उनको करीब से देखते हैं। जल्दी हमला नहीं करते हैं।

2012 में देखा गया था एक कुनबा
2012 में सबसे पहले महोफ रेंज अमरिया क्षेत्र के डयूनीडाम इलाके में टाइगर का एक कनुबा गन्ने के खेत में देखा गया था। उसने वहीं अपने बच्चे दिए। वह जंगल में नहीं गया। बल्कि उन बच्चों को गन्नों के खेत में ही पालता रहा। धीरे-धीरे बच्चे बड़े हो गए। एक के बाद एक 12-15 टाइगर हो चुके हैं। जिनका नाम ही केन टाइगर कागजों में रखा जा चुका हैं।

यह प्रवृत्ति बढ़ी तो होंगे घातक परिणाम
भले ही इंसानों के बीच रहने से केन टाइगर के स्वभाव में बदलाव है। यह बाघों में यह प्रवृत्ति बढ़ी तो इसके परिणाम भी घातक हो सकते हैं। आयेदिन इंसानों और बाघों के बीच खूनी संघर्ष होगा। इसलिए वन विभाग की टीमें उन क्षेत्रों में अभियान के तौर पर कार्य कर रही हैं। जहां गन्नों के खेतों में बाघ देखे जाते हैं। किसानों को समझाया जाता है कि यदि बाघ दिखे तो वहां से दूर चले जाएं। या फिर समूह के साथ खेतों पर जाएं। जिस खेत में काम करना है, वहां ड्रम,ढोल, पीपा बजाकर शोर मचाएं। फिर काम करें। क्योंकि, जानवरों को शोर पसंद नहीं है। वह वहां से दूर चले जाएंगे।

जंगल से गन्ने के खेत में यूं आए बाघ
विशेषज्ञ कहते हैं, बाघिन जब बच्चों को जन्म देती है तो वह सुरक्षित जगह पर जाती है। जहां कोई दूसरा मेल बाघ न पहुंच सके। क्योंकि, बाघ बाघिन को पाने के लिए उनके बच्चों को मार देते हैं। यह हुआ एक बाघिन ने गन्ने के खेत में बच्चे जन्में। बच्चे बड़े हो गए। फिर वह जंगह में नहीं गई। वहीं दो-तीन बार बच्चों को जन्म दिया। केन टाइगर्स का एक कुनबा बन गया।

पर्याप्त मात्रा में मिलता है शिकार
गन्ने के खेत में बाघ को शिकार की कमी नहीं रहती है। नील गाय गन्ने के खेतों में ही रहती हैं। जो रात को बाहर निकलते हैं। जंगली सुअर को गन्ने अधिक पसंद होते हैं। जंगली सुअर भी गन्ने के खेतों में रहते हैं। इसके अलाव पीलीभीत इलाके में हिरन भी काफी पाए जाते हैं। अब तो आवारा गायों के भी काफी झुंडे देखने को मिलते हैं। इसलिए केन टाइगर्स को शिकार की कमी नहीं रहती हैं।

पीलीभीत टाइगर रिजर्व एरिया:60279.80 हेक्टेयर
बफर जोन:12745.18 हेक्टेयर
रेंज:05

भौगोलिक स्वरूप
वन क्षेत्र घोड़ा की नाल के आकार का है। वन क्षेत्र की चौड़ाई लगभग 15 किलोमीटर। कहीं-कहीं पर तीन से पांच किलोमीटर तक है। वन क्षेत्र के समीप 275 गांव आते हैं।

अब तक बाघों के मरने के आंकड़े
मई 2012 में हरीपुर रेंज में बाघ का शव मिला
मई 2012 में हरीपुर रेंज में ही दूसरे बाघ का शव मिला
जून 2012 में पूरनपुर क्षेत्र में मिला बाघ का शव
नवंबर 2013 में बराही रेंज में शव मिला
अक्टूबर 2014 महोफ रेंज में बाघ मृत मिला।
अप्रैल 2015 में पूरनपुर क्षेत्र में बाघ का शव नहर से मिला।
जुलाई 2017 में हरदोई ब्रांच में डूबने से हुई थी बाघिन की मौत ।
मई 2017 माला रेंज में मिले थे दो बाघ शावकों के शव
मार्च 2018 शारदा सागर डैम में उतरता हुआ मिला बाघ का शव
अप्रैल 2018 में रजबहा पटरी पर मिला बाघ का शव
अप्रैल 2018 महोफ में मिला बाघ का शव
20 मई 2018 रजवाह खारजा नहर की पटरी पर मिला बाघ का सड़ा गला शव ।
31 जुलाई 2018 बॉर्डर क्षेत्र के बाजार घाट सुतिया नाला में बाघ का सड़ा गला शव ।
25 जुलाई 2019 पूरनपुर कोतवाली क्षेत्र के मटेहना में ग्रामीण और बाघ के बीच संघर्ष में बाघ की मौत

पीलीभीत टागइर रिजर्व से सटे इलाकों में विभाग को केन टागइर मिले हैं। ये बाघ घने जंगलों को छोड़कर गन्ने के खेतों और बागों को अपना नया ठिकाना बना रहे हैं। यह चौंकाने वाला है। इसके कारणों का विस्तार से अध्ययन कराया जा रहा है। पीलीभीत में जंगल और खेतों के बीच कोई अंतर नहीं है। इसकी एक बड़ी वजह यह भी हो सकती है। बहरहाल, विभाग सभी केन टागइर पर नजर रखे हुए है। ये हालात मानव-बाघ संघर्ष को जन्म न दें, इसके लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं।
ललित कुमार, मुख्य वन संरक्षक

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