राघवेन्‍द्र विक्रम सिंह
टीवी पर दृश्य चलता है …खाली हाइवे पर पैदल चलते माताओं की उंगलियां पकड़े बच्चे, सामान का बोझ लिए युवक दिल्ली से निकल कर अपने गांव बलिया बनारस सासाराम जा रहे हैं. उनके अलावा सड़क पर और कोई नहीं. बेचैन रिपोर्टर सवाल पूछता है, अरे कहां जा रहे हो ?
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… हम जो अपने कमरों में बैठे है , पागलपने की हद तक बेचैन हुए जा रहे है. हे ईश्वर यह क्या है ?  ऐसा दृश्य तो आजाद भारत ने आज तक न देखा था.. कोरोना चीन से फैला और हमारे यहां विदेशों से आने वाले उच्च-मध्य वर्गीय बिजिनेस प्रतिनिधियों, विदेशी व देशी सैलानियों के जरिये फैला है. इसलिये इसकी सक्रियता अभी नगर केन्द्रित है. और नगरों में भी विदेशी पर्यटक, व्यापारिक प्रतिष्ठान, अस्पताल व इनसे जुड़े लोग आदि अधिक प्रभावित हैं. निम्न-मध्य वर्ग व मजदूर वर्ग अभी बचा हुआ लग रहा है. जागरूकता भी तत्काल नहीं हो जाती वह अपना समय लेती है. दिल्ली एक तोताचश्म मतलबपरस्तों की कारोबारी बस्ती है यह हमें,हमारे देश को जानना चाहिए कि यह ऐसा शहर नहीं है जो बेरोजगारों,कमजोरों, गरीबों के परवाह की सोच रखता हो.
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यह सोच लेना कि इस शहर के लोग तीन सप्ताह तक बिना किराये के किसी को रहनें देंगे, बिना काम के भुगतान करेंगे, इस शहर पर, इसके चरित्र पर ज्यादती होगी. इतिहास देख लें यह शहर कभी किसी का नहीं हुआ. इसे तो उन शक्तियों की गुलामी की आदत रही है जो इसे नकेल डाल सके.कभी इतिहास में दिल्ली को किसी सुलतान के विरुद्ध विद्रोह करते सुना ?  इसकी न कोई संस्कृति रही है, न ही कोई चरित्र रहा है और न ही आत्मसम्मान. वे चाहते तो पूर्वांचल, उत्तराखंड, बुंदेलखंड, बिहार से आये श्रमिक समाज को आग्रहपूर्वक रोक सकते थे. इसी दिल्ली में बहुत से लोग यूपी बिहार के भी तो हैं. वे कहां थे ?

वे तो उनके साथ खड़े हो सकते थे कि भाई हम भी बिहार पूर्वांचल के हैं. अगर पंजाबी समाज के कारखानों, दुकानों, मारवाड़ियों के व्यापार से तुमलोग फिलहाल बाहर हो गये और वो लोग कोई सहयोग नहीं दे रहे हैं तो चलो हम यूपी बिहार वाले भी तो हैं यहां. यूपी पूर्वांचल बिहार भी तो भरा हुआ है दिल्ली में. वे क्यों दिल्ली के चरित्र में रंग गये ? कोई सामने क्यों नहीं आया ?

ये पूर्वांचली संगठन क्या मात्र बिरहा चैती कराने और नेतागिरी चमकने के लिए हैं ? आप तो मेहरबान खड़े होते. लेकिन नहीं, आपने तो पूर्वांचल बिहार को एक लांचपैड की तरह इस्तेमाल किया है जिससे कि आप दिल्ली में पैंठ बना सकें. जब आपका अपना मकान दुकान नौकरी वगैरह हो गई, बच्चा मांटेसरी में पढ़ने लगा, चार जगह जान पहचान हो गई तो आप दिल्ली वाले होने लगे. बच्चे दिल्ली विश्वविद्यालय, जे एन यू कल्चर के होने लगे. अब तो उन्हें पढ़ लिख कर अपनी ही परंपरा, धरम संस्कृति को गरियाना था न कि उसके साथ खड़े होना था. आप के लड़के पढ़ लिख कर उन्हीं संस्थानों में मास्टर हो गये. आपने दिल्ली में बस कर अपने मां बाप भाई भतीजों को छोड़ा वो आपसे चार हाथ आगे चले. देश परंपरा गांव डीह बाबा खोझीबीर सब छोड़ दिया.हां, जब राजनीति का मौसम आयेगा तो हो सकता है कि पूर्वांचल के बेटा बहू दमाद बन कर आयें अपना भोजपुरी बिहारीपना भुनाने के लिए.
RAGHVENDRA VIKRAM SINGH
….  तो कौन आगे आकर खड़ा होकर रोकता सड़क पर भूखे पेट बच्चों को कंधों पर टांगे चल रही पूर्वांचल की उन बेटियों, अचानक बेसहारा बेरोजगार हो गये मजदूरों को ? कौन रोकता कि भाई तीन सप्ताह की ही तो बात है, इधर रह जाओ हमलोगों के बीच में ? नहीं कहते बना न तुमसे क्योकि तुम्हारा डी एन ए भी उसी दिल्ली का हो गया है.

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